परीछा या खिलबाड़

12 जून 2018   |  पारुल   (64 बार पढ़ा जा चुका है)

आज कल सीबीएसई का रिजल्ट आ चुका हैं हर तरफ 95% पाने वालों की चर्चा चल रही हैं सोशल मीडिया हो या व्हाट्स एप्प या कुछ और | जिनके 90% हैं या उससे कम वो तो बेचारे शर्म से कुछ कह भी पा रहे मानो वो फेल हो गये हो | इतने मार्क्स की देख कर अक्सर यही सोच में पड़ जाती हूँ की हमारी पूरी की पूरी पीढ़ी कितनी मंदबुद्धि थी जिसमें या तो कोई 60% ला कर कोई स्कूल टॉपपर बन जाता या कोई 75% ला कर स्टेट टॉपपर हो जाता था |

आज कल तो पूछो नहीं बच्चों को इतने मार्क्स देकर उनको कितने देखो धोखे में रखा जा रहा हैं | बच्चों को भी लगता हैं उनमे कोई भी कमी नहीं हैं और उनसे ज्यादा कोई कुछ भी नहीं जानता | पर वो बच्चे कितने बड़े धोखे में जी रहे हैं क्या वो जानते हैं शायद नहीं |

पहले से तय प्रश्नो के देश की बेहतरीन कोचिंग द्वारा तैयार नोट्स को रट कर उसे एग्जाम में ज्यों का त्यों लिखने वाला हमारा टॉपपर बन जाता हैं , इस तरीके से तो हम १२थ क्लास के स्टूडेंट्स की केवल रटने की क्षमता जज कर रहे हैं उनका बौद्विक स्तर नहीं | यही कारण है की थोड़ा सा भी सोचने समझने वाला स्टूडेंट इस रेस में पीछे रह जाता हैं |

देश में केवल रट की मशीने पैदा कर और अच्छी opportunity देकर हम देश का क्या भला कर रहें हैं क्योंकि हमारे ये नेशनल टॉपपर रटे रटाये उत्तर के आलावा न तो कुछ जानते हैं , न समझ पाते हैं , न सोच ही पाते हैं और न ही कुछ बोल या लिख ही पाते हैं | देश के सबसे अच्छे टैलेंट को केवल रटने की मशीन बना कर उनके सम्पूर्ण मानसिक विकास को रोक देना कितना बड़ा पाप हैं |



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