“गज़ल” सुना वो शहर छोड़ जाने लगा है॥

10 जुलाई 2018   |  महातम मिश्रा   (18 बार पढ़ा जा चुका है)

बह्र- १२२ १२२ १२२ १२२ काफ़िया- आने रदीफ़- लगा है


“गज़ल”


यहाँ भी वही शोर आने लगा है

जिसे छोड़ आई सताने लगा है

किधर जा पड़ूँ बंद कमरे बताओ

तराने वहीं कान गाने लगा है॥


सुलाने नयन को न देती निगाहें

खुला है फ़लक आ डराने लगा है॥


बहाने बनाती बहुत मन मनाती

अदा वह दिशा को नचाने लगा है॥


खड़ी है किनारे वही भीड़ अब भी

मगर भाव मंशा चिढ़ाने लगा है॥


छुपाने चली थी कुढ़न आंसुओं की

वही बंध दरिया बहाने लगा है॥


लिखो चाह गौतम गढ़ों नव कहानी

सुना वो शहर छोड़ जाने लगा है॥


महातम मिश्र गौतम गोरखपुरी

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बहुत बहुत धन्यवाद शक्ति जी , जानकर ख़ुशी हुई कि आप गोरखपुर में हैं और अहमदाबाद के निवासी भी हैं, स्वागत है मित्र, मुलाकात होगी कभी न कभी, हार्दिक आभार

शक्ति
20 जुलाई 2018

बहुत अच्छे , मिश्राजी आप कि गजल में दिल छूने वाली बात है ,आप अहमदाबाद में रह रहे है और हम गोरखपुर में , हम अहमदाबाद से है .

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10 जुलाई 2018
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