बूंदें

06 अगस्त 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (270 बार पढ़ा जा चुका है)

आसमां से धरती तक पदयात्रा करती हरित पर्ण पर मोती सी चमकती बूंद बूंद घट भरे बहती बूंदे सरिता बने काली ने संहार कर एक एक रक्त बूंद चूसा बापू ने रक्त बूंद बहाये बिना नयी क्रांति का आह्वान किया बरसती अमृत बूंदें टेसू पूनम की रोगी काया को निरोगी करे मन को लुभाती ओस की बूंदें क्षणभंगुर सम अस्तित्व का जीवन में एहसास कराती खुशी सुनकर दो बूँद ऑखो में झलक आए गमों का साया पडा ऑंसू बन लुढक गये। तरबतर पसीने की बूंदें मेहनतकश बयां करती माथे पर झलकी बूंदें अपराध बोध का आभास कराती मिठास के कण कण एकत्र कर रिश्तों की लडी तैयार करी एक पल, खारी छींट ने हमे अपने से परे टपका दिया

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