कविता

वो शायर था, वो दीवाना था, दीवाने की बातें क्यूँ

वो शायर था, वो दीवाना था, दीवाने की बातें क्यूँकवि:- शिवदत्त श्रोत्रियमस्ती का तन झूम रहा, मस्ती मे मन घूम रहामस्त हवा है मस्त है मौसम, मस्ताने की बाते क्योइश्क किया है तूने मुझसे, किया कोई व्यापार नहीसब कुछ खोना तुमको पाना, डर जाने की बाते क्योबड़ी दूर से आया है, तुझे बड़ी दूर तक जाना हैमंज़िल देखो



कारवाँ गुजर गया

कारवाँ गुजर गया, गुबार देखते रहेकत्ल करने वाले, अख़बार देखते रहे|तेरी रूह को चाहा, वो बस मै थाजिस्म की नुमाइश, हज़ार देखते रहे||मैने जिस काम मे ,उम्र गुज़ार दीकैलेंडर मे वो, रविवार देखते रहे||जिस की खातिर मैने रूह जला दीवो आजतक मेरा किरदार देखते रहे||सूखे ने उजाड़ दिए किसानो के घरवो पागल अबतक सरकार



थोड़ा और समय (हिंदी कविता)

सुबह निकलने से पहले ज़राबैठ जाता उन बुजुर्गों के पासपुराने चश्मे से झांकती आँखेंजो तरसती हैं चेहरा देखने कोबस कुछ ही पलों की बात थी  ________________लंच किया तूने दोस्तों के संगकर देता व्हाट्सेप पत्नी को भीसबको खिलाकर खुद खाया यालेट हो गयी परसों की ही तरहकुछ सेकण्ड ही तो लगते तेरे ________________निक



हे कलम पराजित मत होना

शूल मिलें ,पग -पग पथ में रोड़े अगिन ,मनोरथ में विचलित हो,विद्रोहों से ,हे कलम ,पराजित मत होना ।।यह युद्ध भयानक ,अब होगा जो नहीं हुआ वो सब होगा ।निर्णय शक्ति-पराक्रम का,यदि आज नहीं तो, कब होगा ।अपने भी आलोचक हैं विद्वेषक ,आखेटक हैं ,व्याकुल है भीतर की पीड़ा हे कलम ,धैर्य को मत खोना ।।हे कलम ,पराजित मत



हां ! हमनें गांधी को मार दिया—कविता

हां ! हमनें गांधी को मारा दियाक्‍योंकि वह करता था आदर्श की बातें?क्‍योंकि वह चलता था सचाई-नैतिकता की राह परउसकी दी हुई आजादी हमें नहीं भाई,हम आजादी नहीं चाहते थेहम चाहते थे स्वतंत्रता के नाम परअराजकता एक अव्‍यवस्‍थाजो आजादी आज हम ढो रहे हैवो नहीं है गांधी के सपनों की आजादीबदला इस इस आजादी से कुछ भी



23 सितम्बर 2015

मॉडर्न रसिया (हास्य कविता)-अल्हड़ बीकानेरी

असली माखन कहाँ आजकल ‘शार्टेज’ है भारी,चरबी वारौ ‘बटर’ मिलैगो फ्रिज में, हे बनवारी,आधी टिकिया मुख लिपटाय जइयो,बुलाय गई राधा प्यारी,कान्हा, बरसाने में आय जइयो,बुलाय गई राधा प्यारी।मटकी रीती पड़ी दही की, बड़ी अजब लाचारी,सपरेटा कौ दही मिलैगो कप में, हे बनवारी,छोटी चम्मच भर कै खाय जइयो,बुलाय गई राधा प्या



22 सितम्बर 2015

नेता जी की शिकायत (हास्य कविता)- प्रवीण शुक्ला

एक कवि-सम्मेलन में'नेता जी' मुख्य अतिथि के रूप में आये हुए थे,परन्तु गुस्से के कारणअपना मुँह फुलाये हुए थे ।उपस्थित अधिकांश कविनेताओं के विरोध में कविता सुना रहे थे,इसलिए, नेता जी कोबिल्कुल भी नहीं भा रहे थे ।जब उनके भाषण का नम्बर आयातो उन्होंने यूँ फ़रमाया-इस देश मेंबिहारी और भूषण की परम्परा का कविन



क्रासिंग की परिचित बाला !

नीर भरे नयनों का प्याला, रुधी ज़बान, पैरों में छाला,अपलक देख रही क्रासिंग पे,कोई सेठ, कोई ठेठ, कोई बनता हुआ दिवाला,क्या आज मिल सकेगा मुझे पेट भर निवाला?एक आम आदमी का आम सच, सोच रही,सुस्त सी, कुछ पस्त सी, सिसकी लिए सकुचा रही,इक दबी आवाज़ में, अपनी दुआ का मोल मांग रही....अनायास पड़ी जो दृष्टि मेरी, उस भा



कविता का विषय

काव्य को मानव-जीवन की व्याख्या माना जाता है। मानव जीवन पर्याप्त विस्तृत-व्यापक है। मानवेत्तर प्रवत्ति भी मानव जीवन से सम्बद्ध है क्योंकि उसका भी मानव से नित्य संबंध है। फलतः कविता के विषय की सीमा आंकना सहज-संभव नहीं। मानव-जीवन और मानवेत्तर प्रकृति का प्रत्येक क्षेत्र, अंग, भाव-विचार, प्रकृति-प्रवृत्



शब्दनगरी कविता प्रतियोगिता

शब्दनगरी यूज़र्स के लिए सुनहरा मौका, इस मंच पर आयोजित कविता प्रतियोगिता में भाग लीजिये| इस कविता प्रतियोगिता का विषय, "हमारी मातृ-भाषा: हिंदी" है|प्रतियोगिता के लिए २-४ पंक्तियों में कविता लिखे|चुनी गयी, सर्वेष्ठ् कविताओं को रचनाकार के नाम के साथ शब्दनगरी मंच पर, प्रकाशित किया जायेगा|



आस

अलसायी शाम नेझपकाई बोझल पलकेंऔर घिर आई रातघनी, काली, अँधेरीतेरी यादों की तरहफिर आये तारेऔर छा गयीचमचमाती सीएक चादरऔर इसके साथ हीमन में जगी आसकि तू भी आएइक रोज़औ' बैठें हम साथतारों की चादर तले



विरह

तुम चले जाते होपीछे छोड़ जाते हो तन्हाईमन उदास होता हैफिर भी चेहरे पर नकली मुस्कान चिपकाये देती हूँ तुम्हे विदा और फिर बंद दरवाजे के पीछे बहती हैं गंगा जमुना सुबह आँख खुलती हैऔर तुम नहीं होतेतुम्हारी खुशबू होती हैपर तुम नहीं होतेसुबह का उजालालगता है मटमैला सासुरमई शाम भीचुभती है आँखों मेंक्यों चले जा



समय के साथ

समय के साथ चलते – चलते अब थकने लगा हूँ अथक प्रयासों के बावजूदअक्सर कहीं खो जाता हूँइस भ्रम में कि जाग रहा हूँन जाने कब सो जाता हूँसंबंधों की आंच में अब पकने लगा हूँसमय के साथ चलते – चलते अब थकने लगा हूँऐसा नहीं है कि निराश हो गया हूँभविष्य को ले कर उदास हो गया हूँतपती दुपहरी में भी खूब चला हूँपूस की



समय के साथ | दिव्यांश

https://diwyansh.wordpress.com/2015/06/26/%e0%a4%b8%e0%a4%ae%e0%a4%af-%e0%a4%95%e0%a5%87-%e0%a4%b8%e0%a4%be%e0%a4%a5/



बलदेव पाण्डेय जी की कविता

💐प्रसंग है एक नवयुवती छज्जे पर बैठी है, वह उदास है, उसकी मुख मुद्रा देखकर लग रहा है कि जैसे वह छत से कूदकर आत्महत्या करने वाली है। 💐 विभिन्न कवियों से अगर इस पर लिखने को कहा जाता तो वो कैसे लिखते 🌷मैथिली शरण गुप्त 🌷अट्टालिका पर एक रमिणी अनमनी सी है अहो किस वेदना के भार से संतप्त हो देवी कहो?



24 अगस्त 2015

कुछ गुनगुनाते पल, कुछ मुस्कराते पल !

कुछ गुनगुनाते पल, कुछ मुस्कराते पल,ख़ुशी का अहसास कराते है,बारिश की पहली बूँद जैसे मनभावन, ये पल बार-बार क्यों नहीं आते है,सोचती हूँ कभी तो उत्तर यही मिलता है,गर्मी के बिना बारिश का क्या है महत्व,दुःख के बिना सुख में क्या है तत्व,बस ऐसे पलों को संजोह लो तुम,जो गर्मी में भी शीतलता का एहसास दिलाते है,औ



"कतार से पूछों"

सुना, आतंक का कोई मजहब नहीं होता अर्थी और ताबूत का मातम नहीं होताजलती चिता कब्र की कतार से पूछों आग संग पानी का विवाद नहीं होता || फिर भी लोंग खूब लगाते है लकड़ी दूसरे के माथे की गिराते है पगड़ी सर सलामत तो पगडियां हजार हैं नौ हाथ बिया की एक हाथ ककड़ी ॥ महातम मिश्र



सखी री...

कुछ भूली बिसरी यादें कुछ खट्टे-मीठे पल वो हंसी के ठहाके वो बिन रुके बातें याद आती है सखी री और आँखें हो जाती हैं नम होठों पे होती है मुस्कान और दिल में ये ख़्वाहिश की फिर से हो मिलना तुमसे कभी किसी मोड़ पर फिर से बिताएँ संग खूबसूरत से कुछ पल



सीख

त्वरित करो तय जो करना है। अ-निर्णय की आशंका से, कर्महीन बन क्यों मरना है । असमंजस में समय गॅवाया, हाथ न कुछ आने वाला । पछतावा ही साथ रहेगा, फिरा न पल जाने वाला । निज जीवन के स्वप्न सुहाने व्यर्थ में फिर किससे डरना है.....। अपनी अनुभव की झोली में, चुन चुन कर मोती भर लो । मग के कंटक बीन परे क



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