कविता



सावन



पैमाने के दायरों में रहना... (नज़्म) #ज़हन

पैमाने के दायरों में रहना,छलक जाओ तो फिर ना कहना...जो जहां लकीरों की कद्र में पड़ा होउस से पंखों के ऊपर ना उलझना...किन्ही मर्ज़ियों में बिना बहस झुक जाना,तुम्हारी तक़दीर में है सिमटना...पैमाने के दायरों में रहना,छलक जाओ तो फिर ना कहना...क्या करोगे इंक़िलाब लाकर?आख़िर तो ग



एक गज़ल

विलायत गया न वकालत पढ़ी है।चेहरों पे लिक्खी इबारत पढ़ी है।पढ़ी हैं किताबें, मगर बेबसी में लगाकर के दिल, बस मुहब्बत पढ़ी है।न कर जुल्म इतने के सब्र टूट जाये मेरे भी दिल ने बग़ावत पढ़ी है ।मुनाफे से कम कुछ न मंजूर इसको दुनिया उसूल-ए-तिज़ारत पढ़ी है | मुस्कुराये लब, तो ख



बाज़ार (भारतीय उप-महाद्वीप के सेक्स वर्करों का रोज़नामचा)

खनकते है घुँघरू,रोती हैं आँखें,तबले की थाप पे ,फिर सिसकती हैं साँसें| हर रूह प्यासी,हर शह पे उदासी,यहाँ रोज़ चौराहे पे, बिकती हैं आँहें| ना बाबा,ना चाचा ,ना ताऊ,ना नाना,ना भाई यहाँ है,ना कोई अपना,...!?!... बस एक रिश्ता ,बस एक सौद



सामाजिक समरसता

29 जून 2017 का एक चित्र मुझे परेशान किये था। राजकोट में प्रधानमंत्री का 9 किलोमीटर लम्बा रोड शो लोग अनुमानित ख़र्च 70 करोड़ रुपये तक बता रहे हैं। 9 जुलाई 2017 का दूसरा



मुश्किल रहा है वो

खोया है कितना, कितना हासिल रहा है वोअब सोचता हूँ कितना मुश्किल रहा है वोजिसने अता किये हैं ग़म ज़िन्दगी के मुझकोखुशियों में मेरी हरदम शामिल रहा है वोक्या फैसला करेगा निर्दोष के वो हक़ मेंमुंसिफ बना है मेरा कातिल रहा है वोपहुँचेगा हकीकत तक दीदार कब सनम कासपनों के मुसाफिर की मंज़िल रहा है वोकैसे यक़ीन



बम बम भोलेनाथ

जो पाप-पुण्य से सदा परेजो जन्म-मृत्यु से सदा महान,सुख भी उसका, दु:ख भी उसकासबको देखे एक समानजो पीकर अपमान का बिष, दे सबको जीवन का वरदानखुद रहकर शमशान में जोसोने की लंका दे दे दान जटा में जिसकी गंगा की धाराहै जिससे यह संसार साराहै काल भी



मौक़ा ढूँढता हूँ

कुछ अनकही बातों को कहने का मौक़ा ढूँढता हूँ दिल में छुपे राज़ का इजहार, करने का मौक़ा ढूँढता हूँ खुली आँखों से देखे ख़्वाबों को मुकम्मल करने का, मौक़ा ढूँढता हूँ इस मोहब्बत को तुझ पे लुटाने का मौक़ा ढूँढता हूँ ज़िंदगी के इस पड़ाव परतेरा साथ पाने का मौक़ा ढूँढता हूँतुझे फिर अपना बनाने कामौक़ा ढूँढता



नभ खुली आँखों से देखे

नभ खुली आंखों से देखे, दुःखी दिख रहे हैं सारे। दूषित बसन यह कैसे छाय?, भीड़ लगाए पर सब हारे।शून्य का मन क्यों व्याकुल?, और आंखों में छाय आंसू रे। क्यों अश्रु गिराए ऐसे उसने?, धरा पर टप-टप, टप-टप रे। धरा व्याकुल वि



ख़ुदकुशी करते रहे

यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से मसख़री करते रहेज़िन्दगी भर आरज़ू-ए-ज़िन्दगी करते रहे एक मुद्दत से हक़ीक़त में नहीं आये यहाँ ख्वाब कि गलियों में जो आवारगी करते रहे बड़बड़ाना अक्स अपना आईने में देखकर इस तरह ज़ाहिर वो अपनी बेबसी करते रहे रोकने कि कोशिशें तो खूब कि पलकों ने पर इश्क़ में पागल थे आंसू ख़ुदकुशी करते रहे आ गया



वक़्त बिताया जा सकता है

यूँ भी दर्द-ए-ग़ैर बंटाया जा सकता हैआंसू अपनी आँख में लाया जा सकता हैखुद को अलग करोगे कैसे, दर्द से बोलोदाग, ज़ख्म का भले मिटाया जा सकता हैमेरी हसरत का हर गुलशन खिला हुआ हैफिर कोई तूफ़ान बुलाया जा सकता हैअश्क़ सरापा ख़्वाब मेरे कहते हैं मुझसेग़म की रेत पे बदन सुखाया जा



काश ऐसी हो भारतीय नारी

चली है लाठी डंडे लेकर भारतीय नारी , तोड़ेगी सारी बोतलें अब भारतीय नारी . ................................................ बहुत दिनों से सहते सहते बेदम हुई पड़ी थी , तोड़ेगी उनकी हड्डियां आज भारतीय नारी . .......................................................... लाता नहीं है एक भी तू पैसा कमाकर , क



मोरे पिया बड़े हरजाई रे!

ओ री सखी तोहे कैसे बताऊँ, मोरे पिया बड़े हरजाई रे,रात लगी मोहे सर्दी, बेदर्दी सो गए ओढ़ रजाई रे।झटकी रजाई, चुटकी बजाई, सुध-बुध तक न आई रे!पकड़ी कलाई, हृदय लगाई, पर खड़ी-खड़ी तरसाई रे!अंगुली दबाई, अंगुली घुमाई, हलचल फिरहुँ न आई रे!टस से मस



शामिल रहा है वो

खोया है कितना, कितना हासिल रहा है वोअब सोचता हूँ कितना मुश्किल रहा है वोजिसने अता किये हैं ग़म ज़िन्दगी के मुझकोखुशियों में मेरी हरदम शामिल रहा है वोक्या फैसला करेगा निर्दोष के वो हक़ मेंमुंसिफ बना है मेरा कातिल रहा है वोपहुँचेगा हकीकत



दूसरो की तलाश में

जब भी भटकता हूँ किसी की तलाश मेंथक कर पहुच जाता हूँ तुम्हारे पास मेंतुम भी भटकती हो किसी की तलाश मेंठहर जाती हो आकर के मेरे पास मेंहर दिन भटकते रहे चाहे इस दुनियाँ मेंमिलते रहे आपस में दूसरो की तलाश में ||



किस्साग़ोई

अन्वेष .....किस्सा-दास्ताँ हूँ ,... किस्सागोई का मज़ा लेता हूँ | जो भी ज़ख़्म दिखते हैं , उन्हें अपनी रचना में सजा लेता हूँ | पहले ख़ुद खोदता हूँ कब्र अपनी, फिर खुद को ही काँधे पे उ



तुम्हारे हिज़्र में

गिर रही है आँख से शबनम तुम्हारे हिज़्र में एक ही बस एक ही मौसम तुम्हारे हिज़्र में क़तरे-क़तरे में शरारों सी बिछी है चांदनी बन गयी है हर ख़ुशी मातम तुम्हारे हिज़्र में आईना-ओ-



कोई सहारा तो हो

मिले नज़र फिर झुके नज़र, कोई इशारा तो होयो ही सही जीने का मगर, कोई सहारा तो हो ||स्कूल दफ़्तर परिवार सबको हिस्सा दे दियाजिसको अपना कह सके, कोई हमारा तो हो ||उलझ गये है भँवर मे और उलझे ही जा रहेकोई राह नयी निकले, कोई किनारा तो हो ||टूटे हुए सितारो से माँगते है सब फरियादेंकुछ हम भी मांग ले, कोई सितारा



जिंदगी वीरान है- शिशिर मधुकर

तूने दिल से क्या रुखसत किया जिंदगी वीरान हैसांसें बदन में तो चल रहीं बाकी ना कोई जान हैलाखों जतन मैंने किए तुम याद आना छोड़ दोसब कोशिशें मेरी मगर चढ़ती नहीं परवान हैंतुम मेरे जीवन में थे तो हर जगह लगता था दिलतेरे बिना सूनी ये महफिल अब हुई शमशान हैठीक से सोचा नहीं जब राहें मंजिल की चुनीदेखी हकीकत आज



आभास

परछाई हूँ मैं, बस आभास मुझे कर पाओगे तुम .....कर सर्वस्व निछावर,दिया था मैने स्पर्शालिंगन तुझको,इक बुझी चिंगारी हूँ अब मै,चाहत की गर्मी कभी न ले पाओगे तुम।अब चाहो भी तो,आलिंगनबद्ध नही कर पाओगे तुम,इक खुश्



आसान हिन्दी  [?]
तीव्र हिंदी  [?]
ऑनस्क्रीन कीबोर्ड  [?]
हिन्दी टाइपिंग  [?]
डिफ़ॉल्ट कीबोर्ड  [?]

(फोन के लिए विकल्प)
X
1 2 3 र्4 ज्ञ5 त्र6 क्ष7 श्र8 (9 )0 --   =
q w e r t y u i o p [   ]
a s d िfि g h  j k l ; '  \
  z x c  v  b n m ,, .. ?/ एंटर
शिफ्ट                                                         शिफ्ट बैकस्पेस
x