कविता



शून्य से अनंत तक

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ईश्वर की दृष्टि

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गीता और विज्ञान

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ई-ईश्वर

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सच्चे प्रेमियों को समर्पित

तुम जिसे ठुकरा गयी, वो अब जग को रास आ रहा है,जो सुना तुमने नहीं वो धून ज़माना गा रहा है,तुमने बोला था न बरसेगी जहाँ एक बूँद भी कल,उस जमीं के नभ पे इक्छित काला बादल छा रहा है,रात के डर से अकेला तुमने छोड़ा था जिसे कल ,उसकी खातिर आज सजकर, सूर्य का रथ आ रहा है,काँच का टुकड़ा समझकर फेंक आई तुम जिसे थी,पैसो



अपना हमें बना लेना

हमको ख्वाबों में ख्यालों में तुम बसा लेना,अपने होठो पे हमको गीतों-सा सजा लेना,हम क़यामत तलक न साथ तेरा छोड़ेंगे,हम हैं हाज़िर, हमें जब चाहे आजमा लेना,कोई महफ़िल हो या तन्हाई का आलम कोई,बड़ी मशरूफ़ रहो या रहो खोयी-खोयी ,हर घड़ी साथ निभाने का तुमसे वादा है,जी में जब आये, हमें बेझिझक बुला लेना,साथ कोई दे न दे



झूठी-सी आश

तेरी चाहत के तोहफे हैं,जो इन आँखों से बहते हैं,नहीं तू संग फ़क्त इनको तो मेरे पास रहने दे,महज़ आंसू बता इनको न तू अपमान कर इनका,मेरी उल्फत के मोती हैं, तू इनको ख़ास रहने दे,ज़माना, वक़्त और मजबूरियां मैं सब समझता हूँ,तू जा बेशक, तू मेरे संग तेरा एहसास रहने देन मुझसे छीन ये उम्मीद तू मेरा नहीं होगा,भले झू



जिदंगी खूबसूरत है

जिदंगी जैसी है यारो; खूबसूरत है,है ख़ुशी की भी ग़मों की भी जरुरत है,ना चला है जोड़ जीवन में किसी भी वीर का,वक़्त के साम्राज्य में किसकी हुकूमत है ?बचपना, क्या बुढ़ापन,कैसी जवानी है,तेरी-मेरी, यार सबकी इक कहानी है,मुस्कुराहट खिल रही थी जिन लबों पे कल तलक ,आज उन आँखों में भी खामोश पानी है,था कही जिन आँखों



खाना ठंडा हो रहा है...(काव्य) #ज़हन

साँसों का धुआं,कोहरा घना,अनजान फितरत में समां सना,फिर भी मुस्काता सपना बुना,हक़ीक़त में घुलता एक और अरमान खो रहा है......और खाना ठंडा हो रहा है। तेरी बेफिक्री पर बेचैन करवटें मेरी,बिस्तर की सलवटों में खुशबू तेरी,डायन सी घूरे हर पल की देरी,इंतज़ार में कबसे मुन्ना रो रहा है......और खाना ठंडा हो रहा है। क



वजूद का तमाशा

हस्ती का शोर तो है मगर, एतबार क्या,झूठी खबर किसी की उड़ाई हुई सी है...वजूद अपना खुद ही एक तमाशा है,और अब नजरे-दुनिया भी तमाशाई है...जिंदगी के रंगमंच की रवायत ही देखिए,दीद अंधेरे में, उजाले अदायगी को नसीब है...जवाब भी ढूंढ़ते है सवालों के



झोपड़े का मॉनसून

सौंधी - सौंधी सी महक है मिट्टी के मैदानों में| मॉनसून की पहली बारिश है फूस के कच्चे मकानों में| उसके बदन से चिपकी साड़ी,माथे से बहकर फैले कुमकुम,या केशों से टूटकर गिरते मोतियों क



तुम राम बनके दिल यूँ ही दुखाते रहोगे

अवसर दिया श्रीराम ने पुरुषों को हर कदम , अग्नि-परीक्षा नारी की तुम लेते रहोगे , करती रहेगी सीता सदा मर्यादा का पालन पर ठेकेदार मर्यादा के यहाँ तुम ही रहोगे . .......................................................... इक रात भी नारी अगर घर से रहीबाहर घर से निकाल तुम उसे बाहर ही करोगे , पर लौटके तुम



किस्मत के उलट फेरे – शिशिर मधुकर

मुहब्बत दिल में हो जिनके वो ही तो मान करते हैमिटा के जिस्मों की दूरी उनको एक जान करते हैंउम्मीदें मैंने पाली थी नाज़ बन माथे पे सज जाऊँमगर किस्मत के उलट फेरे मुझको हैरान करते हैमुहब्बत जिनको होती है वो कमियां भी छुपाते हैंमगर जो दिल नहीं रखते सब का अपमान करते हैमीठे बोल चिड़ियों के खुशी हर आंगन में



यकीनन, कमाल करती हो...

तुम जो भी हो,जैसे हुआ करती हो,जिसकी जिद करती हो,वजूद से जूझती फिरती हो,अपने सही होने से ज्यादाउनके गलत होने की बेवजह,नारेबाजियां बुलंद करती हो,क्या चाहिये से ज्यादा,क्या नहीं होना चाहिए,की वकालत करती फिरती हो,अपनी जमीन बुलंद भी हो मगर,उनके महलों को मिटा देने की,नीम-आरजूएं आबाद रखती हो,मंजिलों की मुर



दावेदारी

यथार्थ पर यूं तो दावेदारी सबकी है,दावेदारी की यूं तो खुमारी सबको है,खुमारी की यह बीमारी गालिबन सबको है,मगर, यथार्थ खुद अबला-बेचारी है, पता सबको है।फिर, रहस्यवाद का अपना यथार्थ है,रहस्य क्या है कि सबका अपना स्वार्थ है,अहसास का रहस्यवाद से गहरा संवाद है,जो महसूस होता है, उसका जायका, स्वाद है,फिर दिमाग



गाथा एक वीर की

रचना के पूर्ण रसास्वादन के लिए कृपया पूरा पढ़े …!गाथा एक वीर की******************बहुत सुनी होंगी कहानिया रांझा और हीर कीआओ तुम्हे, आज सुनाये, गाथा एक वीर कीमर मिटते है जो, मातृभूमि पर हॅसते – हँसतेअँखियो में आंसू भरकर सुनाये गाथा वीर की !!सीमा पर शहीद होने की खबर जब घर आई



फिर सो ना सका – शिशिर मधुकर

मैंने सोचा बहुत मैं भुला दूँ तुम्हें लेकिन ये मुझसे हो ना सकातेरी छवियां ना दिखला दें आंसू मेरे मैं तो जहाँ में रो ना सकाउल्फ़त की राहों में हरदम यहाँ संगदिल ज़माने ने घायल कियामैं तड़पा चाहे जितना मगर कांटे औरों की राहों में बो ना सका लाख तोहमत लगीं दामन पे मेरे और हम आखिर जुदा हो गएवो समझेंगे क्या



गर तन्हा कहीं नजर आये

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रेल से अजब निराली है

रेल से अजब निराली हैइस काया की रेल - रेल से अजब निराली है|ज्ञान, धरम के पहिए लागे,कर्म का इंजन लगा है आंगे,पाप-पुण्य की दिशा मे भागे,२४ घड़ी ये खुद है जागे,शुरु हुआ है सफ़र अभी ये गाड़ी खाली है||इस काया की रेल ............एक राह है रेल ने जानाजिसको सबने जीवन मानाहर स्टेशन खड़ी ट्रेन हैअंदर आओ जिसको



सार्थक सुख बोध...

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