कविता



" हमारी मातृ - भाषा : हिन्दी "

मॉं का आँचल थाम कररहता है ज्यूँ हर शिशु सुरक्षितमातृ-भाषा बरतने से ,हो यूँ ही व्यक्तित्व मुखरितज्ञान जितना भी जटिल होग्रहण कर लो सुगमता से"हिन्दी" है स्पष्ट , कोमल,सरल, पूरित सरसता से !!



मैं वापिस आऊंगा - सूरज बड़त्या

मैं वापिस आऊंगा - सूरज बड़त्या जब समूची कायनातऔर पूरी सयानात की फ़ौजखाकी निक्कर बदल पेंट पहन आपकी खिलाफत को उठ-बैठ करती-फिरती होअफगानी-फ़रमानी फिजाओं के जंगल मेंभेडिये मनु-माफिक दहाड़ी-हुंकार भरे....आदमखोर आत्माएं, इंसानी शक्लों में सरे-राह, क़त्ल-गाह खोद रहे होंसुनहले सपनों की केसरिया-दरियाबाजू खोल बुला



कहीं कुछ भी नही है

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रियसब कुछ है धोखा कुछ कहीं नही हैहै हर कोई खोया ये मुझको यकीं हैना है आसमां ना ही कोई ज़मीं हैदिखता है झूठ है हक़ीकत नही है||उपर है गगन पर क्यो उसकी छावं नही है?है सबको यहाँ दर्द मगर क्यो घाव नही है?मै भी सो रहा हूँ, तू भी सो रहा हैये दिवा स्वपन ही और कुछ भी नही है||मैने बनाया



देने वाला देकर कुछ कहता कहाँ है...

कवि:- शिवदत्त श्रोत्रियहर पहर, हर घड़ी रहता है जागताबिना रुके बिना थके रहता है भागताकुछ नही रखना है इसे अपने पाससागर से, नदी से, तालाबो से माँगतादिन रात सब कुछ लूटाकर, बादलदाग काला दामन पर सहता यहाँ है||देने वाला देकर कुछ कहता कहाँ है...हर दिन की रोशनी रात का अंधेराजिसकी वजह से है सुबह का सवेराअगर र



फटी हुई चादर

ठण्ड रात थीउनकी चादर फटी हुई थी,चादर कंप कंपा रही थी,कभी इधर-कभी उधर लुढ़क रहीथी.बस सिर्फ चादर फटी हुईथी,गहरी अँधेरी रात थी,ठण्ड उससे भी ज्यादा ढीठथी....रात जितनी लंबी थी, उससेभी ज्यादा लंबी हो रही थीचादर फटी हुई थी...नींद आँखों में होते हुएभी ठंडे तारों को देख रहीथी...



"मुक्तक"

प्शीर्षक- चतुर - विज्ञ, निपुण, नागर, पटु, कुशल, दक्ष, प्रवीण, योग्य। "मुक्तक" काम न आए हर घड़ी, चतुराई की चाल योग्य निपुड़ता दक्षता, शोभे मस्तक भाल कोशिश करती लोमड़ी, हर्षित होय सियार कर्म कुशल होता बली, नागर बुद्धि विशाल।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"दोहा"

देखो रावण जल रहा, संग लिए दस माथ एक बाण नहि सह सका, धनुष वाण कर नाथ।। पंडित है शूर योद्धा, शिर चढ़ा अहंकार अधर्म सगा कबहू नहि, सगी न निज तलवार।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



"दोहा"

"दोहा" देखो रावण जल रहा, संग लिए दस माथ एक बाण नहि सह सका, धनुष वाण कर नाथ।। पंडित है शूर योद्धा, शिर चढ़ा अहंकार अधर्म सगा कबहू नहि, सगी न निज तलवार।। महातम मिश्र, गौतम गोरखपुरी



" बेटी बचाओ - बेटी पढ़ाओ "

समस्त बेटियों को समर्पित ....जब हुयी प्रस्फुटित वह कलिकाकोई उपवन ना हर्षायाउसकी कोमलता को लख करपाषाण कोई न पिघलाया!वह पल प्रति पल विकसित होतीइक दिनचर्या जीती आईबच बच एक एक पग रखती वहशैशव व्यतीत करती आई!जिसने था उसका सृजन कियाउसने न मोल उसका जानावह था जो उसका जनक स्वयम् उसने न मोह उससे बाँधा !



कविता

बदल रहा है रूप प्रकृति का बदल रहा पैगाम. खून के प्यासे घूम रहे शठ धरती के आवाम. -----------टुकड़ों में बँट जगह-जगह पर लोग लगाते नारा. -----------अगुवा उसी को चुनते सब जो होता ठग हत्यारा. किसी को कुछ भी कहते निर्भय मुँह में नहीं लगाम. बदल रहा है रूप प्रकृति का बदल रहा



माँ

यह कविता मैंने मातृदिवस के उपलक्ष्य में मई २०१६ में लिखी थी।नौं माह गर्भ में रख कर,रक्त से अपने पोषित कर,कड़ी वेदना सह कर भी,नव जीवन का निर्माण किया।हम कर्जदार है उस माँ के,जिसने हमको जन्म दिया।दुनिया में आकर शिशु ने,जो पहला शब्द उदघोष् किया,वो करता इंगित उस स्त्री को,जिसने हमको जन्म दिया।"माँ" शब्द



इक चाँद पाने के खातिर

इक चाँद पाने के खातिरपंछी की शहादत लिख जाऊंगाहै नही तू मेरी किस्मत मेंफिर भी महोब्बत कर जाऊंगा....दिल दुखना फितरत नहीं है मेरी तेरी तरह इतराना आदत नही है मेरी तू भले ही समझ दुश्मन मुझेपर तुमसे कोई बगावत नही है मेरी....बसंत में महकती है खुशबुमै पतझड़ में फूल खिला जाऊंगा'संगम' कहता है जमाना मुझकोदेखना



जय भारत जय!

जय भारतीय रक्षक वीर,मत लेना विरोधियों का खीर-नीर,विरोधियों का सीना देना चीर,जैसे ही कर्तव्य पथ पर वे हों अधीर। तुम्हें देशभक्त शीश नवाते,तुम्हारी जीत के जश्न मनाते,तुम हम सभी क



कहीं अपने ही शब्दों में न संशोधन करो तुम ...

दबी है आत्मा उसका पुनः चेतन करो तुम नियम जो व्यर्थ हैं उनका भी मूल्यांकनकरो तुम परेशानी में हैं जो जन सभी को साथ ले कर व्यवस्था में सभी आमूल परिवर्तन करो तुमतुम्हें जो प्रेम हैं करते उन्हें ठुकरान देना समय फिर आए ना ऐसा कीआवेदन करो तुम



कड़वा सच..

💤 कड़वा सच 💤 क्या आज रावण मरेगा? या उसका एक शीष बड़ेगा. साल दर साल रावण मृत्यु को तरसता रह जायेगा, पर कलयुग में शायद ही कोई राम बन पायेगा . कलयुग में रावण की पुकार, पहले बेटी बचा फिर मुझे मार. समाज का आईना वीभत्स हो रहा है, नारी का अपमान एवं बेटियों का शोषण हो रहा है. राम बचा नही कलयुग



विजया दशमी

विजया दशमी के उपलक्ष पर लिखी रचना विजया दशमी की हार्दिक शुभकामनायें .मेरी चतुर्नवतिः काव्य रचना (My Ninety-fourth Poem).“विजया दशमी”.“विजय मनाऊँ किसकी मैंराम की या रावण की गाथा किसकी गाऊँ मैंराम की या रावण कीराम पिता की आज्ञा से बिन महल चौदह वर्ष बितायेरावण ने बहुत तपस्या से जाने कितने स्वर्ण महल बन



***नारी भी नारायणी भी***

***नारी भी नारायणी भी*** मंगल मृदुल मुस्कानवाली मेरी मैया,दाहक प्रचंड चण्डिका स्वरूपिणी भी है।करूणामयी है, तापनाशिनी है मैया,रिपुदल का दलन करे दुष्टमर्दिनी भी है।ममतामयी वरदायिनी है महामाया,क्रोधित स्वरूप स्वयं भस्मकारिणी भी है।गुण, ज्ञान, बुद्धिदायिनी है मेरी मैया,कष्ट,



एकाकीपन

वो शहर के नुक्कड़ का बड़ा मकान और उसका छोटा सा कमरा, स्मृतियों के पार कहीं भूला कहीं बिसरा। असफलताओं से निराश, मुझे देख उदास, मुझसे लिपट गया और बोला, चल मेरी सूनी पड़ी दीवारों को फिर सजाते हैं, और कुछ नए स्लोगन आदि यहाँ चिपकाते हैं। भूल गया कैसे अपने हर इम्तिहान से पहले



ईर्ष्या

अरुणोदय की मधुमय बेला में मैंने उसे देखा। नव प्रभा की भांति वह भी हर्ष से खिला था, मानो धरा से फूटी किसी नई कोंपल को पहली धूप का स्नेह मिला था। शिष्टता के अलंकार में अति विनीत हो, उसने मुझसे नमस्कार किया , और अप्रतिम आनंद का प्रतिमान मेरे ह्रदय में उतार दिया। मुझे



संतोष

असफलताओं का क्रम, साहस को अधमरा कर चुका है। निराशा की बेड़ियाँ कदमों मे हैं, धैर्य का जुगनू लौ विहीन होता, अँधेरों के सम्मुख घुटने टेक रहा है। और उम्मीदों का सूर्य, विश्वास के क्षितिज पर अस्त होने को है। जो कुछ भी शेष बचा है, वह अवशेष यक्ष प्रश्न सा है। क्या अथक परि



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