कविता



होगी मुलाकात उनसे

भटकते हुए पहुँचा जब उसके दर हो गयी थकन सब दूर सिर्फ़ इसी ख़याल से कि होगी मुलाक़ात उनसेना थी भूख प्यासबस यही थी आस कि होगी उनसे मुलाक़ात आँखें बोझिल थी दिल व्याकुल पर था फिर भी सुकून कि होगी मुलाक़ात उनसे दूर से ही होंगे दीदार उनके पर थी तसल्ली, की होगी मुलाक़ात उनसे २० फ़रबरी २०१७जिनेवा



परामार्थ

विषय - परमार्थवृक्ष देता है हमें आॅक्सीजन,फूल और फल ।नदियाँ देती हैं हमें खाद्य पदार्थ और निर्मल जल ।।प्रकृति हमको देती सब कुछ, निःस्वार्थ भाव से, है सरल ।परहित करती न स्वार्थ वश,सुंदर, सरस, है निर्मल ।।प्रकृति परोपकार,परहित कोसर्वस्व समर्पित करती ।अपनी ममता की छाँव तलेप्राणियों का मन हरती ।



मैं पानी की बूँद हूँ छोटी

मैं पानी की बूँद हूँ छोटी,मैं तेरी प्यास बुझाऊँ।पी लेगा यदि तू मुझको ,मैं तुझको तृप्त कराऊँ।मैं छोटी सी बूँद हूँ,फ़िर क्यों न पहचाने?तू जाने न सही मग़र,किस्मत मेरी ऊपर वाला जाने।मैं पानी की बूँद हूँ छोटी,फ़िर क्यों खोटी मुझको माने?भटकता फ़िर रहा है तू,और क्यों अनजान है तू?तेरी महिमा मैं तो समझूँ न,जाने



अब आदाब करके

मेरे गुनाहों को अब नजर अंदाज करके बनाओ तुम मुझे, खुद को खराब करके ||किस कदर टूट चुका है अब वो देखरात गुजारता है, जिस्म को शराब करके ||अपने हिस्से की चाहत चाहता हर कोईचैन कहाँ है ,मोहब्बत बे- हिसाब करके ||उजड़ा हुआ है यहाँ हर साख का मंजरसोचा चमन से गुजरेगा सब पराग करके ||ये शहर बड़ी जल्दी इतना बड़ा हो ग



तस्वीर

विषय - तस्वीर एक तस्वीर । हर लेती पीर ।। एक है नन्हा बच्चा । भोला भाला सच्चा ।। पहने है कपड़े फटे । बाल न कबसे कटे ।। बीन रहा वो कबाड़ । अंबर की लिए आड़ ।। चेहरे पर है मुस्कान । चल रहा हो छाती तान ।। आँखों में सपने हजार । चाहता अपने लिए प्यार ।। - नवीन कुमार जैन



सँभलिए

सँभलिए --------------- कभी कभी डर लगता है, वो प्यार न मुझसे कर बैठे, साथ मेरा ले भावुक होकर, घरवालों से ना लड़ बैठे। जो थोड़ा परिवार बचा है वह भी टूटा जाएगा, मैं हूँ अकेला, सदा अकेला, कोई मुझसे क्या कुछ पाएगा।। दोष न दे वो भले मुझे पर, खुद को माफ करूँ कैसे?



टाइम का कुछ यूज हो जाये‬

तुम्हारे साथ बैठे टाइम का कुछ यूज हो जाए। तुम्हें चाहे या देखे दिल कन्फियूज होजाए।। तुम्हारे साथ ............| तुम्हें चाहे या देखे............|| हमारी हर कहानी हर जगह सुरखी पर हो दिलवर। कभी हम तुम मिले ऐसे की ब्रेकिंग न्यूज हो जाए।। उसे देने चले एक रोज ग्रीटिंग कार



प्रेम का अहसास

यदि मैं तुम्हे प्रेम करता हूँ,तो सिर्फ प्रेम करता हूँ,मैं प्रेम करता हूँ उस सच्चाई सेजिसे कभी महसूस किया थातुम्हारी आवाज़ में,मैं प्रेम करता हूँ तो उस झूठ से भीजो कभी लज्जित नहीं होता,जो ठहाके लगाता है मेरी न



पत्थरबाज़

वे मासूम हैं और उनके पत्थर अहिंसक । भले दहशतगर्दों की आड़ बन जायें । वे पत्थर मारें और हम फूल बरसायेँ ये भी देखें कि उनमें खार न हों । ऐसे मशवरे जो लोग देते हैं । उन्हें वे पत्थर क्यों न खिलाये जायें ? र र



यह कम है क्या

तुम मेरे साथ हो, यह कम है क्या चाहती हो मुझे, यह कम है क्या भर आती हैं आँखें, मेरे दर्द, मेरी ख़ुशी में, यह कम है क्या बाँट नहीं सकती मेरा समय किसी और के साथ, यह कम है क्याजान छिड़कती हो मुझ पर, यह कम है क्या कर देती हो हँस कर मेरी हर ख़ता को माफ़, यह कम है क्या स्वीकारा है मुझे सब कमज़ोरियों के साथ



हज़ारों की दौड़ में !

हज़ारों की भीड़ में एक दीवाना वो भी था.... उसके नफरत से वाकिफ एक अनजान वो भी था... सच्चाई से परे अपनी ही दुनिया में... अनकही लफ़्ज़ों का एक फ़साना वो भी था... तो सुनते है आपको उस अधूरे प्यार की बात... रोज़ तनहाइयों में कट रही थी उसकी अकेली रात... बताने से कतराता था...छुपाने स



ये कहाँ से आ गयी बहार है

ये कहाँ से आ गयी बहार है ,बंद तोमेरी गली का द्वार है।



भाषायी पाखंडों की धुरी

वह अपनी भाषा में बोलता हैमैं अपनी भाषा में सुनता हूँशब्दों की प्रतीति ऐसी हैविभिन्न अर्थों को गुनता हूँ अर्थ और आशय की दूरीअपनी स्थितियों की मजबूरीभाषायी पाखंडों की धुरीलपलपाती जीभ सेगिरते हुए नमकीन शब्दमिठास के आभास मेंगुमसुम और निःशब्द क्यों ज़मीन की बात खोती हैज़मीन छोड़कर ज़मीन को देखनाहवा में खड़े



बेटियां

हाइकु 5.7.5 के क्रम वाली क्षणिक कविता है और इसमें एक क्षण को उसकी सम्‍पूर्णता सहित अभिव्‍यक्‍त किया जाता है। इस वीडियो में बेटियों के विषय में कुछ हिन्‍दी हाइकु दे रहे हैं। विश्‍वास हैं अवश्‍य पसन्‍द आएंगे। पसन्‍द आने पर लाईकए कमन्‍टए शेयर व सब्‍सक्राईब करें। धन्‍यवाद ! ब



हार का उपहार

हार का उपहार बरसों परवानों को, दीपक कीलौ में जलते देखा है,शमा के चारों ओर पड़ेवे ढेर पतंगे देखा है. कालेज में गोरी छोरी कोघेरे छोरों को देखा है,खुद नारी नर की ओर खिंचे,ऐसा कब किसने देखा है. उसने क्या देखा, क्या जाने,किसकी उम्मीद जताती है,कहीं, ढ़ोल के भीतर पोल न हो,यह सोच न क्यों घबराती है. वह करती



तेरे दिल में जलता है दीपक मेरे प्रेम का

तुम्हें जो देखा तो पलको तले लाखो दिये से देखो जलने लगे .... तुम हो मेरी धड़कन , फिर जिस्म में क्यों नही धडकती हो ...... तुम हो मेरी सांस , फिर क्यों इस तरह उखड़ती हो ?……तू जो नही तो केसी खुशी ?मायूसी मे डूबी ह



कब गीत प्रेम के गाऊँगी

अन्तर्मन का यह आर्तनाद्आत्मा पर आच्छादित विषादजीवन में पसरा अवसाद,कब दूर इसे कर पाऊँगी कब गीत प्रेम के गाऊँगी ?दुर्बल मन के अगणित विकाररुग्णित तन के कुत्सित विचारभावनाओं का उठता ये ज्वार क्या जीत इन्हें मैं पाऊँगी ?कब गीत प्रेम के गाऊँगी ..?जो बीत गया सो बीत गयाजो शेष बचा वह अस्थिर हैअपने इस व्याकुल



माँ-बाप के पैर छुए हुआ एक जमाना

कवि: शिवदत्त श्रोत्रियछोड़ा घर सोच कर, किस्मत आजमाना पर क्यों ना लौट मैं, कोई करके बहाना जन्नत ढूंढता था, जन्नत से दूर होकर माँ-बाप के पैर छुए हुआ एक जमाना ॥



ग़ज़ल

इन बंज़र आँखों में समंदर कल भी था और आज भी हैप्यास से मरना मेरा मुक़द्दर कल भी था और आज भी हैकोई इलाज-ए-ज़ख्म-ए-दिल वो ढूँढ न पाया आज तलकबेबस का बेबस चारागर कल भी था और आज भी हैउसी राह से कितने मुसाफ़िर मंज़िल तक जा पहुँचे, मगरउसी जगह



राह अपनी है चाहे पगडण्डी ही न हो

राह अपनी है चाहे पगडण्डी ही न हो हिम्मत के हौसले हैं उमंग भरी है हरी हरी सी पतझड़ लग रही है विरानो की आवाजों में एक बुलावा सा है हर चाह की रुत में एक चेहरा छुपाया सा है चलने के तरीके भी लड़खड़ा के सीखे हैं पगथलियों में बुवाई को काँटों से बिंधे हैं राहत की साँस से एक स



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