नारीशक्ति :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

21 सितम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (60 बार पढ़ा जा चुका है)

नारीशक्ति :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*किसी भी राष्ट्र का निर्माण व्यक्ति द्वारा होता है,और व्यक्ति का निर्माण एक नारी ही कर सकती है और करती भी है। शायद इसीलिए सनातन काल से नारियों को देवी की संज्ञा दी गई है । लिखा है ---- नारी निंदा मत करो,नारी नर की खान। नारी ते नर होत हैं, ध्रुव-प्रहलाद समान।।राष्ट्र निर्माण में नारियों के योगदान को भुलाया नहीं जा सकता।परंतु बदलते परिवेश में कुछ नारियाँ पतन की सीमा को भी लांघ गई, इसका कारण सिर्फ औऱ सिर्फ उनकी माताओं द्वारा मिले संस्कार ही हो सकते हैं। माँ के द्वारा मिले संस्कारों केदोष के कारण ही ऐसा होता है ।वैसे हर माँ अपने बच्चों में अच्छे संस्कार ही डालना चाहती है परंतु शायद स्वयं उनका पालन करने में चूक जाती है या फिर स्वयं पालन ही नहीं करना चाहती।जबकि एक माँ का आचार-विचार-व्यवहार कन्या के ऊपर अमिट छाप छोडता है।* *धर्म के पालन में संस्कारों की जरूरत होती है, इसलिए कन्याओं में इस बात के संस्कार डालने की जरूरत है जिससे पति ही देवता, पति ही गुरु, पति ही धर्म और पति ही कर्म है, वे मानें। बच्चों पर माँ के संस्कारों का असर होता है। माँ जैसे रहती-करती-धरती है बच्चे भी उसी से अपना आचरण बनाते हैं। इसलिए अपनी कन्या का पतिव्रता बनाने के लिए माँ को भी पतिव्रत धर्म पालन करने की जरूरत होती है। माँ के ज्ञानवान होने से धर्म पालन की संभावना होती है। लेकिन कोरा ज्ञान भी अपना कोई असर नहीं करता। ज्ञान को जीवन में लाने या ज्ञान के अनुसार जीवन बनाने पर ही ज्ञानी होने की सार्थकता है।जिसके पास ज्ञान होता है वह अपने हर एक काम के बाहरी भीतरी रूप को जानती है इसलिए भूलकर भी वह ऐसा कोई काम नहीं करती जो पति के कल्याण और उसकी उन्नति में बाधक हो। पति को खुश रखने की तो कोशिश है पर उसे ऐसे किसी भी रास्ते पर नहीं जाने देती जिससे उसका अहित हो। लेकिन वह उसका शासन नहीं करती, उस पर राज्य नहीं करती, अपनी प्रिय बोली, अपनी सेवा, अपने त्याग अपनी कर्तव्य परायणता और व्यवहार पटुता से वह पति को ऐसे रास्ते से लौटा लाती है जो कि उसे हानि करने वाला होता है। पत्नी की इस तरह की जागरुकता और पति के प्रति तन्मयता उसे इतनी शक्ति दे देती हैं जिससे कि वह यम से भी लड़ सकती है।* *पति को भगवान समझ कर स्त्री अपनी सोई हुई शक्ति को जगा लेती है। इससे वह दासी नहीं हो जाती। इससे तो वह अपने असली रूप को पालती है। वह पति की अंतर्शक्ति को जगाकर माता बन जाती है और स्त्री जन्म को सार्थक कर लेती हैं।*

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