थोथी विद्वता :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

22 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (35 बार पढ़ा जा चुका है)

थोथी विद्वता :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से सनातन धर्म यदि दिव्य एवं अलौकिक रहा है तो उसका कारण हमारे सनातन धर्म के विद्वान एवं उनकी विद्वता को ही मानना चाहिए | संसार भर में फैले हुए सभी धर्मों में सनातन धर्म को सबका मूल माना जाता है | हमारे विद्वानों ने अपने ज्ञान का प्रचार किया सतसंग के माध्यम से इन्हीं सतसंगों का सार निकालकर ग्रंथों की रचनायें होती गयीं एवं सनातन की दिव्यता अक्षुण्ण बनाये रखते में सहायक हुए ये ग्रंथ | ज्ञान के भण्डार होने पर भी इन विद्वानों में कभी भी स्वयं को श्रेष्ठ मनवाने या मानने का भाव नहीं होता था | ऐसा नहीं है कि पहले के विद्वानों में विद्वता का अहंकार नहीं होता था | परंतु यह भी सत्य है कि उनका अहंकार ही उनके पतन का कारण भी बना है | विद्योत्तमा के अहंकार ने उसको कालिदास जैसा मूर्ख पति मिलाया | ऐसे अनेकानेक उदाहरण आपको हमारे आर्षग्रंथों में देखने को मिल जायेंगे | हमारे विद्वानों / महापुरुषों ने सनातन धर्म के विस्तार के लिए सतसंग को माध्यम बनाकर सनातन में प्रतिपादित सिद्धांतों के अनुसार इसका प्रचार किया और अमर हो गये | वह चाहे सूत जी एवं शौनक इत्यादि अट्ठासी हजार ऋषियों का सभा सत्र हो या शिव - पार्वती , शुकदेव स्वामी - परीक्षित , या फिर कागभुशुण्डि एवं गरुण जी का संवाद रहा हो इन सभी सतसंगों से हमें एक नवीन ज्ञान प्राप्त होता रहा है | क्योंकि तब के विद्वानों में बुद्धिमत्ता , अभय , संयम एवं धैर्य होता था | यदि किसी ने किसी बात का विरोध भी कर दिया तो उसे शास्त्रोक्त समाधान के द्वारा संतुष्ट करने का प्रयास हमारे महापुरुष तब तक करते रहते थे जब कि वह संतुष्ट न हो जाय |* *आज हमारे देश में विद्वानों की संख्या कुछ ज्यादा ही हो रही है | पहले सतसंग सिर्फ ऋषियों के आश्रम एवं राजाओं के दरबारों में हुआ करते थे , परंतु आज यह सतसंग घर - घर अपनी - अपनी शय्या पर बैठकर किया जा रहा है | यहाँ तक तो ठीक है कि सतसंग होना चाहिए चाहे जिस माध्यम से हो परंतु दुखद यह है कि संचार माध्यमों (व्हाट्सऐप , फेसबुक) आदि पर अपनी विद्वता प्रदर्शित करने वाले ये विद्वान कहीं न कहीं से सनातन धर्म का ह्रास ही कर रहे हैं | हमारी शिक्षा पद्धति में शास्त्री एवं आचार्य की पदवी को बहुत सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है | परंतु मै "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूँ कि आज अनेक विद्वान अपने ग्रंथों की अपेक्षा गूगल पर कुछ ज्यादा ही आश्रित होते जा रहे हैं | इन गूगलाचार्यों को शायद यह भी नहीं पता है कि गूगल के अनेक ऐसे स्रोत भी हैं जो सनातन का विरोध करते हैं | ऐसी स्थिति में इन तथाकथित गूगलाचार्यों को कोई भी सामग्री गूगल पर देखने के बाद उसे अपने ग्रंथों में देखना चाहिए तभी उसे कहीं प्रेषित करना चाहिए | परंतु आज तो प्रत्येक विद्वान में अहंभाव की अधिकता एवं धैर्य की कमी स्पष्ट देखने को मिल रही है | किसी भी विषय पर अपनी कही बात को ही सर्वोच्च रखवाने के लिए ये विद्वान तर्क - कुतर्क का सहारा लेकर स्वयं की छवि धूमिल कर रहे हैं | आज के सतसंग विद्वानों की अहंता एवं कुतर्क की भेंट चढ रहे हैं | जबकि जो विद्वान होता है उसमें नम्रता का भाव स्वमेव उत्पन्न हो जाता है , परंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह भाव अब बहुत कम ही देखने को मिल रहा है | यही कारण है कि आज सनातन के विद्वानों का मानमर्दन हो रहा है |* *सनातन के विरोधियों द्वारा रचे गये कुचक्रों से यदि बाहर निकलना है तो हमें अपने आर्षग्रंथों का अध्ययन करना होगा जिससे कि आज का विद्वतसमाज विमुख हो रहा है |*

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