अपने ग्रंथों का करें अध्ययन :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

23 अक्तूबर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (52 बार पढ़ा जा चुका है)

अपने ग्रंथों का करें अध्ययन :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन काल से ही संस्कृति का विस्तार करने के उद्देश्य से हमारे ऋषियों / महर्षियों / विद्वानों एवं राजा - महाराजाओं तक ने विशेष योगदान दिया | सनातन संस्कृति का विस्तार कैसे हो ?? इसकी मान्यतायें एवं विचार जन जन तक कैसे पहुँचें ?? इस पर गहनता से विचार करके हमारे महापुरुषों ने समाज में घूम घूमकर सतसंग सभाओं एवं वाद - विवाद प्रतियोगिताओं का आयोजन करना प्रारम्भ किया | जिसके फलस्वरूप मानव गुणग्राही बनने लगा | जहाँ ऋषियों ने अपने आश्रमों में यह व्यवस्था बनाई वहीं राजाओं ने भी एक विशेष भवन (सतसंग भवन) में नित्य बैठकर ज्ञान का आदान - प्रदान करना प्रारम्भ किया | सनातन धर्म इतना विस्तृत है कि इसको जानने एवं समझने के लिए नित्य ही सतसंग की आवश्यकता है | बल्कि सत्य तो यह है कि नित्य सतसंग करने के बाद भी इसके मर्म को पूर्णरूपेण जान पाना सम्भव नहीं है | इन्हीं रहस्यमयी मर्मों को सुलझाने के लिए समाज में ज्ञान का आदान - प्रदान करने एवं मनुष्यों के मस्तिष्क में पनप रही भ्रांतियों को समाप्त करने के उद्देश्य से सतसंग की व्यवस्था की गयी , जिसके माध्यम से "आर्षग्रंथों" का सहारा लेकर उन भ्रांतियों को दूर करने का प्रयास करते हुए मानवमात्र को भटकने से बचाया जाता था | कुछ लोग थोथी अफवाहों के जाल में फंसकर सनातन को झूठा बनाते देखे गये ऐसे लोगों को सनातन धर्म की वैज्ञानिकता भी प्रमाणित करके हमारे ऋषियों ने उन्हें पुन: सनातन मतावलम्बी बनाया | सतसमग करते समय आर्षग्रंथों का सहारा लेकर के मनुष्यों को यह बताया जाता था कि सत्यता क्या है |* *आज मंदिरों एवं गाँवों में तो सतसंग हो ही रहे हैं ! परंतु आज के परिवेश में सतसंग करने का सशक्त साधन बनकर उभरा है सोशल मीडिया | संचार माध्यमों के उपक्रम व्हाट्सऐप एवं फेसबुक का उपयोग बड़े - बड़े विद्वान आज सतसंग के लिए कर रहे हैं | यह ठीक भी है क्योंकि किसी भी माध्यम से सतसंग किया जाय परंतु उसका उद्देश्य एक ही होना चाहिए जनजागृति | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" प्राय: देख रहा हूँ कि आज के कुछ विद्वान पहले की अपेक्षा आर्षग्रंथों का अवलम्ब न लेकरके "गूगल" का प्रयोग अधिक कर रहे हैं | किसी विषय पर यदि ये विद्वान न समझ पाने के कारण आर्षग्रंथों के विपरीत गूगल की कटपेस्ट करके अन्य विद्वानों के विरोध के भागीदार बनते हैं तो इनका एक ही जबाब होता है कि :-- "मैंने यह किसी संत के मुख से सुना है " या फिर मैंने अमुक व्यक्ति से पूछकर लिखा है ! मेरे कहने का मतलब यह है कि ऐसे विद्वान किसी के द्वारा कुछ भी बता देने पर उसकी सच्चाई परखे बिना उसे सार्वजनिक कर देते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि उन्हें विद्वानों का विरोध सहन करना पड़ता है और विवाद की स्थिति उत्पन्न होकर सतसंग के मूल स्वरूप को बिगाड़ने का कार्य करती है | सतसंग को ज्ञानपूर्ण बनाने एवं उससे आम जनमानस को लाभ पहुँचाने के लिए विद्वानों को दूसरों की कही बातों को सुनकर उसे अपने आर्षग्रंथों का अध्ययन करके पुष्टि करके ही सार्वजनिक किया जाय जिससे कि भ्रम की स्थिति न उत्पन्न हो |* *गूगल एक सशक्त माध्यम हो सकता है परंतु उससे भी अधिक सशक्त माध्यम हमें हमारे पूर्वजों ने "आर्षग्रंथों के रूप में प्रदान किया है | आवश्यकता है स्वयं को पहचानकर उन्हें पढने की |*

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