हमारी संस्कृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

21 दिसम्बर 2018   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (49 बार पढ़ा जा चुका है)

हमारी संस्कृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*संपूर्ण विश्व में यदि कहीं पुण्य भूमि है तो वह हमारा देश भारत है , जहां आध्यात्मिकता अपने उच्च शिखर को प्राप्त करती है | आदिकाल से ही इस देश में धर्म संस्थापकों ने समय-समय पर जन्म या अवतार लेकर के संपूर्ण संसार को सत्य की , आध्यात्मिकता की एवं सनातनता की पवित्र धारा से बारंबार स्नान कराया है | हमारे देश भारत की मिट्टी में राम , कृष्ण , सत्यवादी हरिश्चंद्र , छत्रपति शिवाजी , पृथ्वीराज चौहान , महाराणा प्रताप जैसे महापुरुषों ने जन्म लिया है | यहीं पर वेदों का विन्यास करने वाले महर्षि वेदव्यास , शुकदेव स्वामी , बाल्मीकि जैसे पुराणवेत्ता प्रकट हुये , तो महाप्रभु चैतन्य , सूरदास , तुलसीदास , मीरा , शबरी जैसे भक्तों ने जन्म लेकर की सनातन की भक्तिमयी धारा को प्रवाहमान किया है | यह सत्य है कि संपूर्ण पृथ्वी पर यदि कोई पुण्यभूमि है तो हमारा देश भारत है , क्योंकि इस पुण्यभूमि पर जीवों बार बार को आना ही पड़ता है | मानवता का विकास एवं मानव जीवन जीने के लिए आवश्यक क्षमा , धृति , दया , शुद्धता आदि का सर्वाधिक विकास हमारे देश भारत में ही हुआ है | हमें गर्व है कि हम ऐसे देश के वासी हैं | हमारे देश की संस्कृति एवं सभ्यता ने संपूर्ण विश्व को नारी का सम्मान करना सिखाया | आज भी संपूर्ण विश्व में यदि नारी का सम्मान कहीं होता है या नारी अपनी मर्यादा में रहती है तो वह हमारा देश भारत ही है | ऐसी संस्कृति सभ्यता एवं मर्यादा आप को अन्यत्र नहीं देखने को मिलेगी |* *आज हमारा देश भारत इतनी दिव्यता होने के बाद भी अपनी संस्कृति सभ्यता एवं मर्यादा को भूलता चला जा रहा है | यह हमारे देश का दुर्भाग्य है की आज सारी मान्यताएं राजनीतिक दलों के द्वारा प्रायोजित राजनीतिक षडयंत्र की भेंट चढ़ती चली जा रही है | राम , रहीम का यह देश कुछ चंद लोगों के चंगुल में कसमसाता हुआ दिख रहा है | आज इस प्रकार यहाँ धार्मिक , सामाजिक मान्यताओं को राजनीति की दृष्टि से देखा जाने लगा है वह आने वाले भविष्य के लिए सुखद नहीं कहा जा सकता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" देख रहा हूं कि जिस प्रकार पाश्चात्य संस्कृति की चकाचौंध में हमारे देश का युवा एवं युवतियां रहन सहन एवं अपने पहनावे को परिवर्तित कर रहे हैं वह समाज को किस दिशा में ले कर जा रहा है इसको बताने की आवश्यकता नहीं है | आए दिन होने वाली घटनाएं इसका प्रमुख कारण कही जा सकती है | हमें आदिकाल से संयमी एवं शांतप्रिय माना जाता रहा है , परंतु आज हमारा संयम एवं शांतिप्रियता समाप्त होती दिख रही है | हमें यह कहने में किंचित भी कष्ट नहीं हो रहा है कि आज हम विलासी एवं सभ्यता रहित जीवन जीने के आदी होते जा रहे हैं जा रहे हैं जो कि हमारी मान्यताओं के विपरीत है |* *यदि हम स्वयं को नहीं जान पा रहे हैं इसका अर्थ यही निकाला जा सकता है कि हमने न तो अपने इतिहास को पढ़ा है और न ही अपने महापुरुषों के आदर्शों को जानने का प्रयास किया | आइये लौट चलें अपने प्राचीन भारत की ओर |*

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