मानव धर्म :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

09 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (70 बार पढ़ा जा चुका है)

मानव धर्म :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरा धाम पर ईश्वर ने चौरासी लाख योनियों का सृजन किया है | इनमें जलचर , थलचर एवं नभचर तीन श्रेणियाँ मुख्य हैं | इन तीनों श्रेणियों में भी सर्वश्रेष्ठ योनि मानव योनि कही गई है | मनुष्य जीवन सृष्टि की सर्वोपरि कलाकृति है , ऐसी सर्वांगपूर्ण रचना किसी और प्राणी की नहीं है | यह असाधारण उपहार हमको मिला है | हमारे शास्त्रों में लिखा है :- "नहिं मानववात् श्रेष्ठतरं हि किंचित" अर्थात सृष्टि में मानव से अधिक श्रेष्ठ और कोई नहीं है | इस पृथ्वी पर आकर मनुष्य समय के साथ पहले सनातन धर्म फिर अनेकानेक धर्म का अनुयायी बना , परंतु इन सभी धर्मों से उठकर के मनुष्य का पहला धर्म है मानव धर्म | क्योंकि जब जीव एक बार मानव जीवन में आ जाता है तो मानवता उससे स्वयं जुड़ जाती है , और प्रत्येक मनुष्य को इस मानवता का सदैव ध्यान रखना चाहिए , उससे अलग हो जाने पर मानव जीवन की सार्थकता समाप्त हो जाती है | किसी अन्य को संतप्त , कुंठित और प्रताड़ित करके कोई भी धर्म या संप्रदाय सम्माननीय नहीं हो सकता | मनुष्य का धर्म है अपने द्वारा कभी किसी को कोई कष्ट ना हो , क्योंकि हमारे मनीषियों ने उद्घोषणा की है :-- "ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किंचित जगत्यां जगत्" अर्थात :- इस पृथ्वी पर जो भी चराचर वस्तु है वह सब ईश्वर से आच्छादित है | तो जब सब में ईश्वर है तो किसी को कष्ट पहुंचाकर के एक तो मनुष्य मानव धर्म के विपरीत जाता है दूसरे वह ईश्वर का भी अपराधी बनता है | मानव धर्म वह व्यवहार है जो मानव जगत में परस्पर प्रेम , सहानुभूति , एक दूसरे का सम्मान करना आदि सिखा कर हमें उच्च आदर्शों की ओर ले जाता है | किसी भी धर्म का अनुयायी हो उसे सर्वप्रथम मानव धर्म का पालन करना चाहिए क्योंकि मानव धर्म का पालन किए बिना किसी भी धर्म का पालन करना असंभव है |* *आज संसार में इतने धर्म , संप्रदाय एवं मत हो गए हैं कि इनकी गिनती कर पाना संभव नहीं लगता है | अगर यह कहा जाए कि आज मनुष्य अपनी अपनी ढफली अपना अपना राग अलाप रहा है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी | धर्म के नाम पर एक दूसरे की हत्या तक आज मनुष्य कर रहा है , तो विचार कीजिए कि वह किस धर्म का पालन कर रहा है | आज मानव धर्म की प्रथम सीढ़ी मानवता मनुष्य में विलुप्त होती जा रही है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के समाज को देखकर यह कह सकता हूं कि कुछ धर्मान्ध धर्म की आड़ लेकर के अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति तो कर रहे हैं परंतु वे अपने मानव धर्म को भूलते हुए समाज में जीवन यापन कर रहे हैं | ऐसे धर्माधिकारी शायद अपने मूल धर्म को जानते भी नहीं हैं | मानव धर्म का मूल मंत्र है :- जीवो पर दया करना , व आपसी सौहार्द बनाए रखना , परंतु आज मानव निर्दयी बन गया है कि किसी दूसरे की बात छोड़ो आज मात्र कुछ पैसों के लिए दहेज लोभियों द्वारा अपनी ही बहू , अपनी ही पत्नी को जिस प्रकार त्यागा जा रहा है यह मानव धर्म के मुंह पर तमाचा मात्र है | परिवार , समाज और देश में आज जो हो रहा है वह किसी से छुपा नहीं है | मानवता आज खड़ी रो रही है | मानव ही मानव के लिए प्राणघातक और हिंसक बनता जा रहा है जो कि आने वाली पीढ़ियों के लिए सुखद संकेत नहीं है | धर्म के नाम पर लड़ने वालों से यही कहना चाहूंगा किस सबसे पहले मानव धर्म का पालन करना सीखें तब किसी अन्य धर्म के अनुयायी बन सकते हैं |* *इस धरा धाम पर मनुष्य का पहला धर्म मानव धर्म है , और मानव धर्म का स्रोत सनातन धर्म है , क्योंकि सनातन धर्म नें ही मानव धर्म की नींव रखी है | अत: मानव मात्र को सनातन से सीख लेनी चाहिए |*

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