चुनावी वादों से आगे

11 मार्च 2019   |  गौरव लोधी   (69 बार पढ़ा जा चुका है)

चुनावी वादों से आगे

जैसे-जैसे चुनाव का मौसम नजदीक आता है, राजनीतिक वर्ग के पास करने के लिए बहुत से काम होते हैं। लेकिन आम नागरिकों को अपने काम में कटौती करनी पड़ती है, क्योंकि उनके ऊपर नारों की बमबारी की जाती है। साधारण नागरिकों को अलग-अलग राजनीतिक दलों से आने वाली सूचनाओं और आख्यानों को चुपचाप नहीं सुनना चाहिए। उन्हें उन मुद्दों पर निश्चित रूप से कठिन सवाल करने चाहिए, जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उनके दैनिक जीवन को प्रभावित करते हैं। निश्चित रूप से नारों का महत्व है, वे लोगों की भावनाओं को उभारते हैं। लेकिन चुनावी मौसम के दौरान लोगों को नारों के बजाय तथ्यों पर भरोसा करना सीखना चाहिए। वर्ष 2014 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के साथ 'अबकी बार मोदी सरकार' के नारे पर दांव लगाया था। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के प्रति भारी असंतोष के कारण यह नारा काम कर गया। संप्रग के प्रति लोगों में असंतोष भ्रष्टाचार के आरोपों, बढ़ती महंगाई पर लगाम लगाने में विफलता और नीतिगत अपंगता आदि के कारण था। भाजपा के उम्मीदवार मोदी 'सबका साथ-सबका विकास', अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने और रोजगार के वायदे के साथ सत्ता में आए-ये ऐसे मुद्दे थे, जो पूरे देश के निराश मतदाताओं, खासकर युवाओं की भावनाओं के साथ प्रतिध्वनित होते थे। लेकिन सभी नारे हमेशा कामयाब नहीं होते। वर्ष 2004 के लोकसभा चुनाव में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने अपने प्रसिद्ध इंडिया शाइनिंग नारे के साथ चुनाव लड़ा, जबकि कांग्रेस लोगों के पास यह नारा लेकर गई कि 'आम आदमी को क्या मिला'? लोगों ने कांग्रेस को चुना, क्योंकि कुछ ही लोगों के लिए इंडिया चमक रहा था और ज्यादातर लोगों के जीवन में अंधेरा पसरा था। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव का सबसे यादगार नारा कौन होगा? निस्संदेह भाजपा के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा, मोदी द्वारा सुरक्षित मजबूत राष्ट्रवाद और उनका नेतृत्व महत्वपूर्ण मुद्दा होगा। पुलवामा आतंकवादी हमले की जबावी कार्रवाई की पृष्ठभूमि में, भाजपा इस बात पर जोर देगी कि भारत ने पाकिस्तानी क्षेत्र में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी प्रशिक्षण शिविरों को सफलतापूर्वक नष्ट कर दिया है। लेकिन भारतीय मतदाताओं के रोजमर्रा के जीवन को प्रभावित करने वाले अन्य मुद्दे कहां हैं? हमें अब तक यह नहीं पता कि आने वाले दिनों या हफ्तों में विपक्ष किस तरह से भाजपा के आख्यानों की बराबरी करेगा। लेकिन एक साधारण नागरिक के नाते हरेक राजनीतिक दल से, जो हमारा वोट चाहता है, कुछ कठिन सवाल पूछना जरूरी है। हमारा देश एक गहरे कृषि संकट की गिरफ्त में है। भारत के किसान खुद को बेहद असुरक्षित महसूस करते हैं। हाल के वर्षों में अनेक किसानों ने खुदकुशी की है। किसानों की दुर्दशा मोदी सरकार के कार्यकाल में ही नहीं शुरू हुई है, लेकिन यह पूछना महत्वपूर्ण है कि पिछले पांच वर्षों में उनकी स्थिति में सुधार के लिए क्या किया गया है और अगर भाजपा फिर से चुनाव जीतकर सत्ता में लौटती है, तो किसानों के लिए उसके पास क्या प्रस्ताव हैं। यहां कुछ तथ्य पेश करना प्रासंगिक लगता है। हमारे देश की 70 फीसदी ग्रामीण आबादी अब भी अपनी आजीविका के लिए जमीन और जमीन से जुड़ी गतिविधियों पर निर्भर है। सामाजिक-आर्थिक और जातिगत सर्वे-2011 के आंकड़े बताते हैं कि लगभग 54 फीसदी ग्रामीण आबादी के पास अपनी जमीन नहीं है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि (पीएम-किसान) पांच एकड़ या उससे कम जमीन पर खेती करने वाले लघु और सीमांत किसानों को प्रति वर्ष 6,000 रुपये प्रत्यक्ष आय सहायता के रूप में हस्तांतरण का प्रस्ताव करता है। इससे 12 करोड़ से अधिक छोटे किसानों को फायदा होने की उम्मीद है। लेकिन क्या वह पर्याप्त होगा? इसलिए अब जबकि लोकसभा के चुनाव सिर पर हैं और विभिन्न राजनीतिक दल आम मतदाताओं से वोट मांगने उनके पास आएंगे, हमें उनसे सवाल पूछने चाहिए, जो शासन कर रहे हैं और उनसे भी सवाल पूछने चाहिए, जो शासन करने के आकांक्षी हैं।

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