दंपत्ति

11 मार्च 2019   |  सौरभ शर्मा   (62 बार पढ़ा जा चुका है)

दंपत्ति  - शब्द (shabd.in)

मेरे पुराने मित्र शर्मा जी किसी पुराने पंडित की तरह धर्म क्रियाओं के पीछे भागने वालों में नहीं हैं, वो तो अपनी ही कपोल-कल्पनाओं में गुम रहने वाले स्वतंत्र विचारों के प्राणी हैं। उनकी अर्धांगिनी जी भी उन्हीं के प्रकार की हैं मगर भिन्नता के साथ। आप कला और विज्ञान में रुचि रखते हैं तो आपकी पत्नी वाणिज्य क्षेत्र में। आप भगवान पर विश्वास करने के लिए कारण ढूंढतें हैं पर आपकी पत्नी जी भगवान पर आँख मूंद कर भरोसा कर लेती हैं। दोनों की खूबियां अलग हैं मगर विचार एक समान है।

शर्मा जी एक नजर में किसी देव से कम मालूम नहीं होते तो श्रीमती जी भी किसी स्वर्ग-सुंदरी से कम नहीं हैं। बहुत सोच-समझ कर विधाता ने यह जोड़ी बनाई है। अगर उन्हें कभी तेज बोलते सुने तो ये न समझे कि वे आपस में झगड़ रहे हैं बल्कि ये तो उनका वाद-विवाद करने का पुराना तरीका है। वाद-विवाद या तर्क-वितर्क के समय ऊँचा बोलना मानव व्यवहार का एक पुराना हिस्सा है। हमारे संसद में तो इस ध्वनि-अस्त्र का प्रयोग हर रोज होता है। पत्नी जी किसी भी पूरानी भारतीय वधु की तरह पतिव्रता हैं, अगर उन्हें सती भी कहा जाए तो कम न होगाा किंतु वाद-विवाद में पति से हार मान लेना उन्हें किसी तरह रास नहीं आता। जहां शर्माजी अपने नियमों का पालन करने वाले कड़क और दृढ़ संकल्प वाले मानव हैं वहीं शर्माजी की पत्नी अपनीनर्मदिली के लिए पड़ोस भर में सुप्रसिद्ध हैं। महाशय जितना दिल खोल कर खर्च करते हैं, पत्नी जी उतनी ही चतुराई से बचत भी कर लेती हैं। आप जब कभी मजाकिया मूड में होतें हैं तो रानी जी गंभीर हो जाती हैं।

देवी को आभूषणों से रत्ती भर लगाव नहीं है और शर्माजी कितनी ही बार रुष्ट हो चुके थे। मगर एक बार उन्होंने मुझसे कहा था ‘‘आप की भाभी की ये सादगी ही तो हमें इनका सबसे अच्छा गुण लगता है और साथ ही इनकी पाक कला का भी मैं कायल हूँ। अगर ये रूपवती ना भी होती तो भी इन्हीं दो गुणों के कारण इनसे ब्याह रचाने में मुझे कोई हर्ज नहीं था।’’ पाक कला की तो भाभी जी सचमुच धनी हैं। साल भर पहले ही शर्मा जी के छोटे चाचाजी रिटायर होकर आए थे। एक बड़े भोजन का तय होना तो स्वभाविक ही था। आस-पड़ोस और सभी रिश्तेदारों का न्योता भेजा गया। कुछ खास व्यंजन श्रीमती जी ने अपने हाथों से बनाए। युवा जीभ तो ऐसे व्यंजनों के स्वाद को ना समझ पाई मगर वृद्धों और खाने के शौकिन लोगों ने देवी जी की दिल खोलकर प्रशंसा की। संस्कृति के अध्ययन से पता चलता है कि पहलेके समय में लोगों की खाने में बड़ी रूचि हुआ करती थी। वर्तमान समय का युवा वर्ग उस, किसी भी तरह का स्वाद पहचानने की कला में निपुण ‘जबान’, को विरासत में अपने बुजुर्गों से नहीं ले पाया।

शर्माजी अच्छे खासे चित्रकार तो बचपन से ही थे। जब से मंगनी हुई थी तब से मिस शर्मा के ही चित्र बनाने में रविवार की छुट्टी बिता देना उनके लिए स्वर्ग में बिताए समय के समान था। इस सहृदयता और मेहनत के साथ बनी अपनी तस्वीरों को देखकर तो श्रीमती जी भी उनकी प्रशंसा के पुल बांध देती हैं। इस तरह शर्माजी ने उन्हें अपने प्रेमजाल में फांसा था। उस दंपत्ति को अपने विवाह को व्यवस्था विवाह कहना कतई पसंद नहीं है, दोनो ही इसे प्रेम-विवाह की संज्ञा देते हैं। मैं अक्सर इस का जिक्र उनके सामने कर बैठता और अपने विचारों से इसे व्यवस्था विवाह बताना चाहता मगर उनस प्रेमी जोड़े के बुद्धिपूर्ण विचारों के सामने विवश होकर मुझे अपनी हार को गले लगाना पड़ता था।

दोनो एक दूसरे के प्रेम में अक्सर बंधे दिखाई देते हैं। क्या कहें प्रेम है ही ऐसी चीज जिसमें ना वक्त का ध्यान रहता है ना स्थान का। कितनी ही बार मेरे सामने ही शर्माजी पत्नी जी पर शरारत भरे प्रेम-बाण छोड़ते हैं और पत्नी जी शर्म से भरे नेत्र लेकर वहां से चली जाती। फिर शर्मा जी गर्व के साथ मेरे सामने अपनी प्रेमलीलाओं का वर्णन करते। अपनी वधु के सौंदर्य पर उन्हें बड़ा गर्व है। मुझसे कितनी ही बार कहते ‘‘ भैया चाहे हजार रुपये की शर्त लगा लो अगर मेरी पत्नी जैसी चतुर, कला-निपुण और सुंदर स्त्री तुम्हें सारे संसार में कहीं मिल जाए।’’ और इसी तरह ना जाने क्या-क्या कहते। मैं अपने पैसे इस बेसिर-पैर की शर्त पर बेकार नहीं करना चाहता तो उनकी हां में हां मिला देता हूं।

शर्माजी की मित्रता के साथ-साथ भाभी जीे के हाथों का बना खाना खाने के लालच में मैं अब भी उनके घर अक्सर जाता रहता हूं। कई बार तो दोनों मेरे सामने ही वाद-विवाद शुरू कर देते हैं और मैं अपनी खैरियत के लिए दोनो पक्षों के समर्थन में बोलता हूं। आखिर इससे उनके बीच प्रेम बढ़ता ही तो है तो इसमें मुझे दखल देने की भला क्या जरूरत है? मेरे अनुसार इनका दांपत्य जीवन आम युवा दंपत्ति के लिए एक अच्छा आदर्श बन सकता है। इस युगल में मतभेद, सहयोग, प्रशंसा, गुस्सा, डांट आदि हर तरह

का भाव जो हमें दो दंपत्तियों के बीच देखने को मिल सकता है। इन्हीं भावों के आधार पर ही तो इनके बीच का रिश्ता एक आदर्श रिश्ता बन पाया।


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