पर उपदेश कुशल बहुतेरे :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

29 अप्रैल 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (104 बार पढ़ा जा चुका है)

पर उपदेश कुशल बहुतेरे :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*जब से इस धराधाम पर मानव का सृजन हुआ तब से लेकर आज तक मानव समाज को दिशा प्रदान करने के लिए कुछ विशेष व्यक्तियों के सहयोग एवं सेवा को कदापि नहीं भुलाया जा सकता | पृथ्वी के भिन्न-भिन्न भागों में अपने - अपने समाज को आगे बढ़ाने में एक दिशा निर्देशक एवं मार्गदर्शक अवश्य होता है | जिसे विद्वान कहा जाता है | हमारे भारत देश के विद्वानों ने मानव मात्र के कल्याण के लिए अनेकों नियम बनाए एवं सर्वप्रथम स्वयं उन नियमों का पालन करके समाज को दिखाया , क्योंकि वह जानते थे कि किसी को कुछ बताने से अच्छा है स्वयं करके दिखाया जाय | समाज में मनुष्य कुछ बताने से मानने की अपेक्षा नकल अधिक करता है | मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम ने पूरे जीवन काल में एक अद्भुत एवं अविस्मरणीय मर्यादा का उदाहरण प्रस्तुत किया | उन्होंने किसी से भी नहीं कहा कि आप इसका का पालन कीजिए अपितु स्वयं करके यह दिखाया कि मनुष्य को अपने जीवन काल में किन परिस्थितियों में क्या करना चाहिए , इसीलिए उनको मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया | हमारे विद्वानों ने मानव समाज को विधिवत संस्कृति एवं संस्कार में ढालने का प्रयास किया जिसके फलस्वरूप आज मनुष्य अपने क्रियाकलापों से संपूर्ण विश्व में राज्य कर रहा है | समाज में क्या करना उचित है ? और क्या अनुचित है , क्या अनुकरणीय और क्या त्याज्य है इसका निर्णय हमारे समाज की विद्वानों के द्वारा किया जाता है | परंतु परिस्थिति तब विषम हो जाती है जब विद्वानों के द्वारा ही ऐसे कृत्य किए जाने लगते हैं जो कि अमान्य होते है इसे कितना सही माना जाय ??* *आज के समाज में जहां मिथ्याभिमान , क्रोध ,मोहािद की प्रबलता दिखाई पड़ रही है , वहीं एक चीज और देखने को मिल रही है कि लोग किसी समाज विशेष या किसी व्यक्ति विशेष के पास ज्ञानी बनने का प्रयास करते हैं , और समाज जब उन्हें विद्वान मानने लगता है तो उनके द्वारा ऐसे कृत्य किए जाने लगते हैं जो कि समाज के अनुकूल नहीं होते हैं | अपनी विद्वता के माध्यम से समाज को नई दिशा एवं दशा प्रदान कराने वाले ऐसे विद्वान समाज को तो सदुपदेश करते हैं परंतु स्वयं का कार्य उसके विपरीत भी होता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज समाज में ऐसे अनेक विद्वानों को देख रहा हूं जिन का दोहरा चरित्र देखने को मिलता है | ऐसे विद्वान किसी भी समाज के मंच पर बैठकर के उपदेश तो बड़े अच्छे देते हैं परंतु अपने ही बताए हुए उपदेशों का पालन उनके स्वयं के द्वारा नहीं किया जाता | कोई भी उपदेश तभी प्रभावी हो सकता है जब उसका पालन उपदेशक भी करें , अन्यथा ऐसे व्यक्तियों को उपदेशक या विद्वान मानना मूर्खता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है | किसी को कुछ बताने से पहले स्वयं उसका पालन करने का प्रयास करना चाहिए तभी वह उपदेश समाज को प्रभावित कर सकता है अन्यथा कदापि नहीं | परंतु दुखद है कि आज बताने वाले ज्यादा है और स्वयं पालन करने वालों की संख्या कम होती जा रही है |* *समाज को दिशानिर्देश देने में विद्वानों का विशेष योगदान रहा है | विद्वान अपनी गरिमा एवं पद के अनुकूल आचरण करके ही पूज्यनीय हो सकता है |*

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