मनुष्य एवं प्रकृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

10 जून 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (45 बार पढ़ा जा चुका है)

मनुष्य एवं प्रकृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*परमपिता परमात्मा ने सुंदर सृष्टि का सृजन किया | ऊँचे - ऊँचे पहाड़ , पहाड़ों पर जीवनदायिनी औषधियाँ , गहरे समुद्र , समुद्र में अनेकानेक रत्नों की खान उत्पन्न करके धरती को हरित - शस्य श्यामला बनाने के लिए भिन्न - भिन्न प्रजाति के पेड़ पौधों का सृजन किया | प्राकृतिक संतुलन बना रहे इसलिए समयानुकूल ऋतुएं प्रकट हुईं | चौरासी लाख योनियों का सृजन करके उन सबकी शिरमौर मानवयोनि बनाई और मनुष्य अपने बुद्धि - विवेक , बल एवं कार्यशैली से इस सम्पूर्ण पृथ्वीमण्डल का अधिपति हो गया | प्रकृति की छटा इतनी सुहानी थी एवं ईश्वर द्वारा बनाई गयी समयबद्धता इतनी पारदर्शी थी कि समय समय पर गर्मी , ठण्ढक , बरसात एवं बसन्त स्वयं अपने क्रियानुसार मनुष्य को आनन्द प्रदान करते थे | आदिकाल से ही भारत के विकास में कृषिकार्य का महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है | भारत कृषि प्रधान देश है | भारत की कृषि प्राचीन समय में प्रकृति पर ही आधारित थी | जब किसान को खेतों में जल की आवश्यकता होती थी तब मेघ जलवृष्टि करते रहते थे | प्राकृतिक संतुलन इतना अच्छा था कि मनुष्य दिन रात मेहनत करते वृक्षों की छाया में अपनी थकान तो मिटाता ही थासाथ चैन की वंशी भी बजाता था | परंतु धीरे - धीरे मनुष्य ने अपनी आवश्यकतायें बढ़ानी प्रारम्भ कर दीं और यहीं से मनुष्य ने प्रकृति का दोहन प्रारम्भ कर दिया और बिगड़ने लगा प्राकृतिक संतुलन | पृथ्वी पर मौसम के परिवर्तन एवं मनुष्य को जीवनदायिनी स्नच्छ वायु प्रदान करने में वृक्षों का महत्त्वपूर्ण योगदान है | इसीलिए हमारे पूर्वजों ने विभिन्न रूपों में "प्रकृति पूजा" का विधान बनाया था | परंतु मनुष्य ने इन वृक्षों को ही निशाना बनाकर विकास पथ पर आगे बढ़ा जिसका परिणाम समस्त पृथ्वी को असंतुलित बरसात एवं भीषण गर्मी के रूप में भोगना पड़ रहा है | परंतु हमारा चक्षुन्मीलन नहीं हो पा रहा है | समय समय पर प्रकृति हमें सावधान करती रहती है परंतु हम अपनी मस्ती में बढ़ते चले जा रहे हैं |* *आज का मनुष्य लोभ के वशीभूत होकर प्रकृति का दोहन कर रहा है | मनुष्य की अति-उपभोगवादी प्रवृत्ति के कारण प्रकृति को इतना नुकसान पहुँच चुका है कि प्रकृति की मूल संरचना ही विकृत हो गई है | यदि हम यह विचार करें कि जिस प्रकृति की मनुष्य पूजा करता था, वह उसके प्रति इतना क्रूर कैसे हो गया ? तो यही उत्तर प्राप्त हो सकता है कि :- समय के साथ मनुष्य की सोच में परिवर्तन आ गया है | प्रकृति के साथ सहजीवन व सह-अस्तित्व की बात करने वाला मनुष्य कालान्तर में यह सोचने लगा कि यह पृथ्वी केवल उसके लिए ही है; वह इस पर जैसे चाहे वैसे रहे | अपनी इस नवीन सोच के कारण वह प्रकृति को पूजा व सम्मान की नहीं अपितु उपभोग की एक वस्तु के रूप में देखने लगा | मनुष्य के विचारो में आया यह परिवर्तन ही पर्यावरण असंतुलन का आधार बना | आज का मनुष्य अपनी आर्थिक उन्नति के लिए ”कोई भी कीमत” देने को तैयार है | उस ”कोई भी कीमत” की सबसे बडी कीमत प्रकृति को ही देनी पड़ती है | भारी औद्योगीकरण आज विकास का पर्यायवाची बन गया है | इन बड़े उद्योगों की स्थापना से लेकर इनके संचालन तक प्रत्येक स्तर पर पर्यावरण को नुकसान पहुँचता है | इन औद्योगिक इकाइयों के निर्माण के लिए वनों की कटाई की जाती है | मेरा "आचार्य अर्जुन तिवारी" का मानना है कि मनुष्य को पर्यावरण की रक्षा के लिए अपनी विकासात्मक गतिविधियों को रोकना जरूरी नहीं है | परंतु इतना जरूर है कि हमें पर्यावरण की कीमत पर विकास नहीं करना चाहिए क्योंकि विकास से अभिप्राय समग्र विकास होता है केवल आर्थिक उन्नति नहीं |* *मनुष्य को मात्र इतना ध्यान रखना चाहिए कि ये पेड-पौधे नदियां-तालाब. वन्य-जीव हमसे पिछली पीढ़ी ने हम तक सुरक्षित पहुँचाया है |अतः हमारा दायित्व है कि हम इसे अपनी आने वाली पीढी तक सुरक्षित पहुँचाये |*

मनुष्य एवं प्रकृति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

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