संतान सप्तमी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

05 सितम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (418 बार पढ़ा जा चुका है)

संतान सप्तमी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा भारत देश एवं उसकी संस्कृति इतनी दिव्य एवं अलौकिक है यहां नित्य कोई ना कोई पर्व , कोई न कोई व्रत मनाया कि जाता रहता है | हमारे ऋषि - महर्षियों ने मात्र के कल्याण के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में इतने विधान बता दिये हैं कि शायद ही कोई ऐसा दिन हो जिस दिन कोई व्रत - उपवास , पर्व - त्यौहार ना हो | इसी क्रम में आज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की सप्तमी को "संतान सप्तमी" का व्रत किया जाता है , इसे पुराणों में "ललिता सप्तमी" भी कहा गया है | संतान की प्राप्ति एवं संतान की रक्षा के लिए किया जाने वाला यह व्रत बड़ी श्रद्धा एवं भक्ति के साथ माता-पिता के द्वारा किया जाता है | यह व्रत सूर्योदय के साथ प्रारंभ होकर दोपहर तक किया जाता है | माता पिता सुबह स्नान करके भगवान शिव पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करके उनका पूजन करते हैं एवं पूजन के क्रम में भगवान शिव पार्वती की हाथों में रक्षा सूत्र (कलावा) बांधा जाता है | पूजन के बाद पूरे परिवार के साथ भगवान शिव पार्वती की आरती एवं प्रसाद वितरण करने के बाद जो रक्षा सूत्र प्रतिमा में बांधा गया है उसे खोल करके अपनी संतान के हाथों में बांधकर उनके रक्षा की कामना की जाती है | उसके बाद जलपान करके दिन व्यतीत किया जाता है | सायंकालीन बेला में पुन: भगवान शिव पार्वती का पूजन करके व्रत का समापन करें | इस व्रत का वर्णन स्वयं भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से किया था | जब कंस के द्वारा देवकी की संतानों की हत्या की जा रही थी तब लोमश ऋषि ने वसुदेव देवकी को "संतान सप्तमी" का व्रत रखने का विधान बताया था | वसुदेव देवकी ने "संतान सप्तमी" का व्रत किया और भगवान कन्हैया के साथ-साथ अपने मृत पुत्रों को भी पुनः वापस पाया | किसी भी व्रत का फल अवश्य मिलता है आवश्यकता है उसमें श्रद्धा एवं विश्वास की |*


*आज आधुनिक युग के लोग अनेक प्रकार के व्रत करते तो हैं परंतु उनको प्रायः शिकायत रहती है कि उस व्रत का उनको यथोचित परिणाम नहीं प्राप्त हुआ | यदि किसी व्रत का परिणाम मनोनुकूल ना मिले तो यह समझना चाहिए कि हमारी श्रद्धा एवं विश्वास में कहीं न कहीं से कमी थी | जिस प्रकार कोई विद्यार्थी परीक्षा में बैठने के बाद अपने विवेकानुसार प्रश्नपत्र को हल तो करता है परंतु शायद प्रश्न के अनुसार उत्तर नहीं मिल पाता और वह अनुत्तीर्ण हो जाता है तो इसमें दोष उस प्रश्नपत्र का नहीं होता है दोष होता है विद्यार्थी का जिसने सही ढंग से प्रश्नपत्र को हल नहीं किया | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" यह बताना चाहूंगा कि सनातन धर्म के व्रत एवं पर्व अलौकिकता से भरे हुए हैं | परंतु यदि उनका पालन करने पर भी परिणाम हमको नहीं मिल पा रहा दोष पर्वों का नहीं बल्कि अनुत्तीर्ण हुए उसी विद्यार्थी की तरह हमारा ही है | क्योंकि हमने ना तो अपने सनातन धर्म के पर्वों के विषय में जानना उचित समझा और ना ही जानने के बाद उसका ढंग से पालन करना | आज कोई भी व्रत पर्व प्रायः लोग दिखावे के लिए करते हैं और उनमें श्रद्धा एवं विश्वास की कमी स्पष्ट परिलक्षित होती है | कोई भी व्रत लोकलज्जा के भयवश न करके पूर्ण श्रद्धा एवं विश्वास के साथ करना चाहिए | यदि उसके प्रति आपकी पूर्ण श्रद्धा एवं दृढ़ विश्वास है तो उसका फल अवश्य प्राप्त होगा |*


*संतान सप्तमी के दिन किया गया व्रत यदि देवकी मैया के मृत पुत्रों को वापस कर सकता है तो आज भी यदि इस व्रत का विधि विधान से पालन कर लिया जाए तो सुखद परिणाम अवश्य प्राप्त होगा |*

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