कसक

02 अक्तूबर 2019   |  SURENDRA ARORA   (428 बार पढ़ा जा चुका है)

लघुकथा


कसक


दिन ढले काफी देर हो चुकी थी ।

शाम, रात की बाहों में सिमटने को मजबूर थी । वो कमरे में अकेला था । सोफे का इस्तमाल बैड की तरह कर लिया था उसने । आदतन अपने

मोबाईल पर पुरानी फिल्मों के गाने सुनकर रात के बिखरे अन्धेरे में उसे मासूमियत पसरी सी लगी । वो उन गानों के सुरीलेपन के बीच अपने तल्ख हुए सुरीले अतीत में खो गया । मस्तिष्क के कोटरो में वे कोमल और संगीतमय पल फिर से जीवन्त हो उठे जो उसने , उसके साथ पूरे समर्पण भाव से गुजारे थे । वो बड़ी शीद्द्त से उसकी क्रिया पर अपनी ओर से सकारत्मक और ह्रदय में उतर जाने वाली प्रतिक्रिया देती थी । उन दिनो उसे कभी लगता ही नहीं था कि जीवन में वो उससे कभी अलग भी हो सकता है

कहते हैं न कि समय कभी स्थिर रह पाता तो फिर प्रक्रती के काल चक्र को हर कोई अपनी मुट्ठियों में ही कैद कर बैठ जाता ।

हालात कुछ एसे अनहोने बने कि उसकी लाख कोशिशों के बाद भी वो उससे अलग हुई और एसी अलग हुई कि फिर उसने कभी वापस मुड़कर उसकी नजरों का सामना नहीं किया ।

वो जल बिन मछली की तरह छटपटा कर रह गया ।

समय के साथ भले ही उसकी छपटाहट में कुछ कमी आ गयी पर अलगाव के इतने सारे साल बीत जाने के बाद भी उसे बहुत बार लगता कि बीते हुए ये साल उसके जहन पर परत दर परत किसी बोझ में ही बदलते रहे हैं ।

इसलिये जब कभी वो जिन्दगी की भागमभाग से हट कर अपने करीब आता तो खुद को फिर उसी के करीब पाता । उसके अन्दर का हर कोश उससे मिलने या कम से कम उससे बात करने के लिये बेताब हो जाता , जबकी वो जानता था कि इसमें से कुछ भी मुमकिन नहीं है । वो बड़ी कसक के साथ अपने आप से पूछता , " कभी - कभी समय अगर बेहद कोमल और संगीतमय होता है तो वही समय खुद को बदल कर इतना कठोर और क्रूर कैसे हो जाता है ! "

उसके पास अपने ही सवाल , फिर से सवाल बन कर उससे टकरा जाते ।

आज की शाम , जो रात की तरफ पहले ही बढ़ चुकी थी , और पुराने गानों में उसे नहला भी चुकी थी , ने उसके ह्रदय की कसक को एक बार फिर से छू दिया । उसने मोबाईल में से संदेश वाला आपशन निकाल कर उसका नम्बर निकाला और लिखा , " ये आदमी तुम्हें जीवन की अन्तिम सांस तक वैसे ही याद करता रहेगा जैसे कभी तुम किया करती थीं । "

उसने लिख तो दिया पर जब उसकी अंगुलियां ओ के वाले बटन की तरफ बढिं तो ठिठक गयीं ।

उसने मोबाईल का मेसेज बाक्स हटाया और कमरे में घिर आये अन्धेरे को उजाले में बदलने के लिये बिजली के स्विच की तरफ अपने हाथ को बढ़ा दिया ।

कमरे में रोशनी ने अपनी जगह बना ली थी । कमरे में टंगे कलंडर में समुंदर के किनारे खड़ा बच्चा दूर छितिज को देखते हुए मुस्कुरा रहा था ।

उसकी ओर देख कर उसकी इच्छा हुई कि उसे भी मुस्कुराना चाहिये ।

उसने अपनी हथेलियों पर नजर दौडाई , वहां कुछ लकीरें पहले की तरह अब भी स्थिर थीं ।


सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

साहिबाबाद ।

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