खो गयी सहयोग की भावना :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

09 दिसम्बर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (457 बार पढ़ा जा चुका है)

खो गयी सहयोग की भावना :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस संपूर्ण विश्व में प्रारंभ से ही भारत देश अपने क्रियाकलापों एवं दूरदर्शिता के लिए जाना जाता रहा है | विश्व के समस्त देशों की अपेक्षा भारत की सभ्यता , संस्कृति एवं आपसी सामंजस्य एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत करता रहा है | यहां पूर्व काल में एक दूसरे के सहयोग से दुष्कर से दुष्कर कार्य मनुष्य करता रहा है | भारत गांवों में बसता है ऐसा यदि कहा जाता है तो इसका एक कारण था कि जहां शहरों में लोगों को प्रत्येक वस्तु महंगे दाम पर प्राप्त होती थी वही गांव में महंगाई थी ही नहीं | इसका एक प्रमुख कारण था कि बाजारवाद का विस्तारीकरण गांवों में नहीं हुआ था और लोग दैनिक उपयोग की वस्तुएं सब्जी आदि अपने खेतों या छप्परों पर उगा लेते थे | आपसी सहयोग का सामंजस्य यह था कि यदि गांव में एक व्यक्ति के छप्पर पर कोई सब्जी फलती फूलती थी तो उसका उपयोग पूरा गांव करता था | इसके साथ ही शादी - विवाह , कथा - भागवत आदि का आयोजन लोग बहुत ही आनंद से करते थे क्योंकि पूरे गांव का सहयोग उसमें प्राप्त होता था और मनुष्य को भार नहीं लगता था | गांवों में बाजार में बहुत कम लगते थे परंतु फिर भी लोग प्रेम से आवश्यक आवश्यकताओं की पूर्ति करते हुए जीवन यापन करते थे | धीरे धीरे बाजारवाद का विस्तारीकरण हुआ और दैनिक उपयोग की वस्तुएं बाजारों में बिकने लगीं , लोग धीरे-धीरे अकर्मण्य होते गए और अपने खेतों और छप्पर से उन्होंने दैनिक खाद्य वस्तुओं को उगाना बंद कर दिया जिसके कारण महंगाई नाम के दानव ने अपना मुंह फैलाना प्रारंभ कर दिया | एक प्रमुख कारण यह भी कहा जा सकता है किस समाज में आपसी सामंजस एवं सहयोग की भावना विलुप्त होती गयी और गांव हो या शहर किसी की भी आवश्यकताओं पर लोगों ने ध्यान देना बंद कर दिया , क्योंकि मनुष्य की स्वयं की आवश्यकताओं की पूर्ति करने में समय व्यतीत होने लगा |*


*आज के वर्तमान युग में चारों तरफ महंगाई अपने चरम पर है | दैनिक खाद्य वस्तुएं एवं अन्य उपयोग कारी वस्तुएं महंगी तो हुई ही साथ ही यदि मानवता की बात की जाए तो सबसे महंगा हो गया है एक दूसरे का सहयोग | अन्य वस्तुओं को जहां धन देकर खरीदा जा सकता है वही सहयोग किसी भी कीमत पर क्रय नहीं किया जा सकता | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज समाज में देख रहा हूं कि यदि किसी के पुत्री का विवाह होता है तो वह स्वयं को बेच डालने को भी तत्पर हो जाता है | जहां पहले पूरा गांव बिना कहे सहयोग के लिए तत्पर हो जाता था वही आज गांव की तो बात छोड़ दीजिए परिवार के लोग भी सहयोग नहीं करना चाहते हैं | हमने विकास तो बहुत कर लिया है लेकिन विकासवाद के इस बाजार में हमने बहुत कुछ खोया भी है | सबसे कीमती वस्तु आपसी सामंजस्य एवं सहयोग की भावना आज बहुत कम देखने को मिलती है , इसका प्रमुख कारण है स्वयं की स्वार्थपरता | अपने स्वार्थ में दूसरों के आवश्यक आवश्यकताओं का ध्यान ना देना एवं किसी के भी कार्य में सहयोग न करना आज का शगल बन गया है | भारत के गांव अपनी प्राचीनता , भव्यता एवं आपसी प्रेम का जो उदाहरण प्रस्तुत करते थे आज वो कहीं देखने को नहीं मिला है क्योंकि आज मनुष्य की स्वयं की आवश्यकता ही नहीं पूर्ति हो पा रही तो वह दूसरों का सहयोग कहां से करेगा | ऐसा नहीं है कि आज समाज में ऐसे लोग नहीं हैं | आज भी एक दूसरे का सहयोग करने वाले इसी समाज में उपस्थित हैं परंतु यदि एक व्यक्ति सहयोग के लिए तैयार होता है तो चार व्यक्ति ऐसे होते हैं जो यह सोचते हैं कि अमुक व्यक्ति का कार्य कैसे बिगड़ जाय | आपसी द्वन्दता आज अपने चरम पर है | कृषि प्रधान देश में लोगों ने आज कृषि कार्य को तिलांजलि दे दी है घरों का नवीनीकरण होने से घर के छप्पर पर उगाई जाने वाली सब्जियां आज बाजारों में खरीदनी पड़ रही है | मेरे कहने का तात्पर्य है यह है कि दैनिक उपयोग की वस्तुएं महंगी हो गई हैं इसका कारण बाजारवाद है परंतु आपसी सहयोग सबसे महंगा हो गया है यह चिंतनीय विषय है |*


*एक दूसरे का सहयोग करके मनुष्य दुष्कर से दुष्कर कार्य कर सकता है इसलिए सहयोग की भावना को बनाए रखने का प्रयास प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए , और समय पड़ने पर एक दूसरे का सहयोग करते हुए एक उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए |*

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