ऋतुराज

10 नवम्बर 2017   |  पुरूषोत्तम कुमार सिन्हा   (192 बार पढ़ा जा चुका है)

ऋतुराज

फिजाओं ने फिर, ओस की चादर है फैलाई,

संसृति के कण-कण पर, नव-वधु सी है तरुणाई,

जित देखो तित डाली, नव-कोपल चटक आई,

ऋतुराज के स्वागत की, वृहद हुई तैयारी.....


नव-वधु सी नव-श्रृंगार, कर रही ये वसुंधरा,

जीर्ण काया को सँवार, निहार रही खुद को जरा,

हरियाली ऊतार, तन को निखार रही ये जरा,

शिशिर की ये पुकार, सँवार खुद को जरा.....


कण-कण में संसृति के, यह कैसा स्पंदन,

ओस झरे हैं झर-झर, लताओं में कैसी ये कंपन,

बह चली है ठंढ बयार, कलियों के झूमे हैं मन,

शिशिर ऋतु का ये, मनमोहक है आगमन.....


कोयल ने छेड़े है धुन, सुस्वागतम ऋतुराज,

रंगबिरंगे फूलोवाली, संसृति लेकर आई है ताज,

सतरंगी सी है छटा, संग झूम रहा ये ऋतुराज,

गीत गा रहे पंछी, शिशिर ने खोले हैं राज....

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