घाटे में बैंक : संशय में जनता

11 जून 2018   |  वेदप्रकाश भरद्वाज   (69 बार पढ़ा जा चुका है)

घाटे में बैंक : संशय में जनता


डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज


भारत सरकार द्वारा देश की अर्थव्यवस्था के मजबूत होने और आगे बढ़ने के दावों के बाद भी हकीकत यह है कि देश के आर्थिक आधारों में से एक बैंकिंग क्षेत्र लगातार संकट में है। यह संकट इसलिए नहीं है लोगों को उसमें विश्वास नहीं रहा और लोगों ने बैंकों में घन जमा रखना बंद कर दिया है बल्कि इसलिए है कि उनमें रखा धन अब पहले की तरह सुरक्षित नहीं रह गया है। जमीनी हकीकत यह है कि आज भी आम भारतीय नागरिक की नजर में अपनी बचत को सुरक्षित रखने और उससे ब्याज के रूप में कुछ कमाने की दृष्टि से बैंक और डाक विभाग सबसे पहली पसंद हैं, बावजदू इसके कि बैंकों में बचत पर लगातार ब्याज दरें कम हुई हैं। इसका एक बड़ा कारण यह है कि आज भी भारतीय नागरिक गैर परम्परागत बचत माध्यमों पर यकीन नहीं कर पा रहा है। ऐसे में अपनी बचत को आय का साधन बनाने के लिए उसका शेयर बाजार और म्यूचुअल फंड जैसे पूंजी बाजारों पर यकीन करना मुश्किल है। एक तो इन पूंजी बाजारों की व्यवस्था को समझ पाना उसके बूते की बात नहीं है। दूसरे इसकी अस्थिरता को नियंत्रित करने का उसके पास कोई उपाय नहीं है। भारत में शेयर बाजार कोई नई चीज नहीं है परंतु आर्थिक उदारीकरण से पहले वह बचतकर्ताओं और छोटे निवेशकों में आज जितना लोकप्रिय नहीं था।


पिछली शताब्दी में 90 के दशक में आये बूम ने पहली बार भारतीयों को अपनी पूंजी को रातों-रात बढ़ाने का रास्ता दिखाया। परन्तु जैसे ही शेयर बाजार धराशाई हुआ छोटे निवेशकों को तगड़ा झटका लगा। उसके बाद से शेयर बाजार में होने वाली उथल-पुथल की तुलना में बैंकों में कायम स्थिरता लोगों को अधिक विश्वसनीय लगती है। यही कारण है कि शेयर बाजार में लोगों की भागीदारी बढ़ने के बाद भी बैंकों के प्रति आकर्षण व विश्वसनीयता कम नहीं हुई। परंतु पिछले कुछ सालों में जिस तरह विजय माल्या, नीरव मोदी आदि के प्रकरण सामने आये हैं उससे बैंकों की साख को नुकसान पहुंचा है। ऊपर से आये दिन आने वाली उन खबरों ने आम लोगों को चिंतित कर दिया है कि क्या उनका धन बैंकों में सुरक्षित है? पिछले कुछ समय से लगातार इस तरह की खबरें आ रही हैं कि बैंकों ने कुछ बड़े औद्योगिक घरानों को और व्यापारियों को नियमों को ताक पर रखकर कर्ज दे दिया जिसकी वापसी संभव नहीं हो पायी हैं। उद्योगपतियों और व्यापारियों को कर्ज देना बैंकों की आमदानी का एक जरिया है परंतु अब यही जरिया उसके गले की फांस बन गया है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार देश के 21 बैंकों को विŸा वर्ष 2016.17 में 85,370 करोड़ का घाटा हुआ जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में इन बैंकों को 473.72 करोड़ का लाभ हुआ था। यह लाभ एक साल में ही घाटे में नहीं बदला है और न ही बैंकों ने एक ही साल में इतना कर्ज बांटा है कि उसकी वसूली न होने से घाटा हो। यह एक लंबी प्रक्रिया का नतीजा है।


दरअसल बैंकों ने नियमों को ताक पर रखकर इतना अधिक कर्ज दे दिया और समय पर उसकी वसूली का प्रयास नहीं किया कि अब उसकी वापसी सपना हो गयी है। यहां तक कि कर्ज के बदले बंधक रखी गयी या जब्त की गयी सम्पिŸायों से इतना धन नहीं मिल पा रहा है कि फंसे कर्ज की भरपाई हो सके। इस संदर्भ में हम विजय माल्या की अचल सम्पिŸायों की नीलामी को देख सकते हैं। सवाल उठता है कि आखिर हमारी सरकार क्या कर रही है। पिछले दिनों जब पंजाब नेशनल बैंक, जिसका घाटा सबसे ज्यादा है, घोटालों के कारण चर्चा में आया था तब भी यह सवाल उठा था कि तमाम नियमों के बाद भी आखिर बैंक किसी को इतना अधिक कर्ज कैसे दे सकता है जबकि सब जानते हैं कि एक साधारण नागरिक को कर्ज लेने में कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। बैंकों द्वारा अक्सर अपने खातों में इस तरह के समायोजन किये जाते रहे हैं कि नुकसान की जगह लाभ दिखाया जा सके। पर जब लम्बे समय तक बड़े कर्जों की वापसी नहीं हो पाती है तब पता चलता है कि जिसे अभी तक लाभ बताया जा रहा था वह तो वास्तव में गंदगी को कालीन के नीचे ढंकना भर था।


यदि एक व्यक्ति बैंक से कर्ज लेकर बाइक या कार खरीदता है या फिर घर खरीदता है तो समय पर कर्ज न चुकाने की स्थिति में बैंक उसे जब्त कर लेते हैं और जमानती से भी वसूली का प्रयास करते हैं। और यह सब होता है कुछ हजार से लेकर कुछ लाख तक के कर्ज के लिए। परंतु कई सौ या हजार रूपये के कर्ज की मूल रकम तो छोड़िये ब्याज की भी जमा न कराने पर भी बैंक बड़े लोगों के गिरेबान को नहीं पकड़ता। बैंकों के घाटे का एक प्रमुख कारण यदि औद्योगिक व व्यापारिक कर्ज का डूबना है तो दूसरी तरफ सरकार द्वारा समय-समय पर किसानों और अन्य लोगों के माफ किये जाने वाले कर्ज भी हैं। अब यहां सवाल उठता है कि आम जनता का क्या होगा जो आज भी अपनी बचत को सुरक्षित रखते हुए कम वृद्धि पर संतोष रखती है और बैंकिंग व्यवस्था में पूरा यकीन रखती है। आज यदि लोग यह प्रश्न करने लगे हैं कि क्या उनका पैसा बैंकों में सुरक्षित रहेगा तो उनकी चिंता जायज है।


इस बात की पूरी संभावना है कि सरकार रिजर्व बैंक के माध्यम से घाटे के गर्त में डूबे बैंकों को बचा ले परंतु क्या यह इस समस्या का सही हल होगा? माल्या और नीरव मोदी के मामलों के सामने आने के दौरान ही कई ऐसी खबरें आयीं जिनसे पता चला कि बैंकों ने कई ऐसी कंपनियों को सैकड़ों करोड़ का कर्ज दे दिया जिनके पास उतने मूल्य की परिसम्पिŸायां तक नहीं हैं। ऐसे कर्ज की वसूली कभी भी सम्भव नहीं हो सकेगी। हाल फिलहाल सरकार भले ही बैंकों को तात्कालिक संकट से उबार ले परंतु यह समस्या का ठोस और स्थाई हल नहीं होगा। बैंकों में घोटाले न हों इसके लिए कड़े नियम हैं जिनका पालन करने में कोताही बरती जाती है। सरकार को इस तरह के प्रावधान करने होंगे कि बैंकों में कर्ज देने में सक्षम अधिकारी नियमों को ताक पर रख कर मनमानी न कर सकें। साथ ही बड़े कर्जों के संदर्भ ऐसी निगरानी व्यवस्था भी बनानी होगी जिससे त्वरित कार्रवाई कर आसन्न संकट को रोका जा सके।


डॉ. वेद प्रकाश भारद्वाज वरिष्ठ पत्रकार

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