बळ्यो सम्प रो बूंट

25 जून 2018   |  कुं.भोजराज सिंह -मणकसास-   (159 बार पढ़ा जा चुका है)

जय श्री राम

बळ्यो सम्प रो बूंट राजपूत केवल एक जाति ही नहीं है बल्कि यह धैर्य, साहस, शौर्य, त्याग, सच्चरित्रता, स्वामिभक्ति एवं सुशासन का पर्याय भी है । कवियों ने इसे समाज व दीन-दुखियों के हितैषी के रूप में इंगित किया है - रण खेती रजपूत री, कबहू न पीठ धरै । देस रुखाळै आपणो, दुखियां पीड़ हरै ।। यह समाज का वह अंग है जो देश और समाज के हित में अपने प्राणों तक का उत्सर्ग करने में तनिक भी संकोच नहीं करता है - मरणों पण हटणों नहीं आ रण खेतां रीत । भली निभाई हेम रा, रजवट हंदी रीत ।। किन्तु इतनी बड़ी जिम्मेदारी (रक्षा) को निभाने के लिए गुणों के साथ साथ बल (शक्ति) का होना भी बहुत आवश्यक है ।शक्ति से ही समाज में सन्तुलन बना रह सकता है अन्यथा इसमें विकृतियां आ जाती हैं - गुण बिन करै गरूर, बळ बिन बोलै आकरो । आय बिना व्यय पूर, चलै किता दिन चकरिया ! जो समाज गुणवान ठाकुर को पलकों पर बिठाएे रखता है वही समाज गुणहीन 'ठाकुर' को कूड़ेदान में डालने में भी देर नहीं करता है - गुण बिन ठाकर ठीकरो, गुण बिन मीत गंवार । गुण बिन चन्दण लाकड़ी गुण बिन नार कुनार ।। अन्य गुणों के अलावा धैर्य को भी राजपूत का धर्म माना गया है, इसलिए उसे सीख देते हुए कहा गया है - धीरै धीरै ठाकरां धीरै सब कुछ होय । धीरां का घरवास, उतांवळा री देवळ्यां ।। संसार में कुछ लोग केवल 'अपने' लिए जीते हैं , कुछ समाज और राष्ट्र के लिए , कुछ मान-सम्मान और कुछ नाम के लिए जीते हैं , कुछ दाम के लिए । सच्चे राजपूत को मान-सम्मान के साथ समाज और राष्ट्र के लिए जीने की प्रेरणा देता हुआ कवि कहता है कि - नाम रहन्दा ठाकरां, नाणा नहीं रहन्त । कीरत हंदा कोटड़ा, पाड़याँ नहीं पड़न्त ।। राजपूत की मूँछें उसके सम्मान और स्वाभिमान की प्रतीक मानी गईं हैं , वह अपने सम्मान के लिए सर्वस्व न्यौछावर कर देता है और यह सही भी है कि - हाथी , घोड़ा , गाँव , गढ़ , ऐतो मिलै अनंत । इजत गयोड़ी ना मिलै , कह राजा जसवंत ।। राजपूत की चारित्रिक दुर्बलताएँ न केवल उसके स्वयं के लिए घातक है बल्कि पूरे समाज के लिए विनाशकारी होती है : बड़ बुगलै सूं बीगडै , बानर सूं बनराय । गाँव 'कु-ठाकर' बीगडै , बंस कपूतां जाय ।। मूर्ख ठाकुर भी समाज के लिए कम हानिकारक नहीं है । यह भी कई प्रकार से अनर्थ करता है - धन,जोबन अर ठाकरी , तां ऊपर अविवेक । ऐ च्यारूं भेळा हुवै , अनरथ करै अनेक ।। कई महान् गुणों के होते हुए भी राजपूत की प्रतिष्ठा को सुरापान ने आघात पहुंचाया है - मद पीतां मुजरो करै , इणरो कौण विचार । अकल कहै जी ठाकरां , जाती करूँ जुहार ! इस जाति को शक्ति , साहस , धैर्य और निर्भयता जैसे योद्धाओं के गुणों के बावजूद 'आपसी फूट के दुर्गुण' के कारण पददलित होना पड़ा है - फोकट मैं कर फूट , कौरव-पांडव कट मरया । खानदान गया खूट , चोखा चोखा चकरिया ।। फ़क़त फळी इक फूट, घर घर गाँवों गाँव मैं । बळ्यो सम्प रो बूँट चिन्ह ही मिटग्यो चकरिया!

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