मैं और मेरा शहर

16 जुलाई 2018   |  गौरीगन गुप्ता   (150 बार पढ़ा जा चुका है)

मैं और मेरा शहर सौन्दर्यीकरण का अद्भुत नमूना शोरगुल भरें, चकाचौंध करते जातपात, धर्म वाद से परे पर अर्थ वाद की व्यापकता बचपन की यादों से जुडा मेरी पहचान का वो हिस्सा जानकर भी अनजान बने रहते आमने सामने पड जाते तो कलेजा उडेल देते प्रदूषण, शोर, भीड़ भरा शहर ना पक्षियों की चहचहाहट भोर होने का एहसास कराती ना उगते सूरज की रोशनी नयी उमंगों से भरती मेहमानों को आगाह देता कौवा नहीं पडोसी क्या खलल डाले दरारों से चैन की सांस घुसती तक नहीं बस, तडके ही लम्बी लम्बी लाइनें मटके, बाल्टी लिए पानी भरने की मारामारी स्कूल बस पकडने को गणवेश में भागते बच्चे जोश भरे सब अपने अपने काम काज को निकल पकडते कठिन चुनौतियों से भरा जीवन नित्य नए जटिलताओं से जूझते सुख सुविधाओं की दौड़ में गला काट प्रतियोगिता में जोशीले मिजाज ,समय को पकडते तनाव भरा, उद्धेश्य परक जीवन आधुनिकीकरण का चोला ओढे पर मानसिक शांति नसीब नहीं तंग दिल वाले बसते सिर उठाती ईमारतो में कुढे में दफन आत्मा एहसासों का दमन होता पत्थर दिल इंसान बनता खोखली मुस्कुराहट ओढे वक्त का रोना रोते व्यस्तता से प्यार या व्यस्त रहना मजबूरी कि शव पर चार आसूं बाहने की फुर्सत नहीं भाईचारे की भावना से परे आभासी रिश्ते बन जाते रोज कुचलते सपनों पर ढाढस कोई बधाता नहीं बस, बसता है इन शहरों में कीडेमकोडे की तरह बिलबिलाती भीड गाडिय़ों के होर्न, रंग-बिरंगी रोशनी जहां चांद तारों की चमक दिखती नही फिर भी ,भीड़ में मेरा कद छोटा जरूर हुआ पर, आस की डोर छोडी नहीं।

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