सनातन सिद्धांत :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

13 जनवरी 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (42 बार पढ़ा जा चुका है)

सनातन सिद्धांत :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म के नियम व सिद्धांत समस्त मानवजाति के लिए प्रेरणास्रोत होने के साथ ही जीवन को दिव्य बनाने वाले रहे हैं | एक मनुष्य का जीवन पापरहित रहते हुए कैसे दिव्य बन सकता है इन रहस्यों के दर्शन यदि कहीं प्राप्त हो सकता है तो वह है सनातन धर्म | सनातन धर्म ने मनुष्यों को अपने ज्ञान , विद्या व धन का अहंकारी बनने से समय समय पर सचेत किया है , क्योंकि ऐसा करने वालों का पतन शीघ्र हो जाता है | हमारे शास्त्र ही हमारे मार्गदर्शक रहे हैं और शास्त्रो का ज्ञान कराने के लिए हमारे गुरुदेव ने अपना बहुमूल्य समय लगाया होता है अत: किसी को भी कभी भी अपने शास्त्रों एवं गुरु का अपमान नहीं करना चाहिए | सनातन धर्म ने प्रत्येक मनुष्य को अपने विचारों को पवित्र बनाये रखते हुए मधुर वचन ही बोलने का निर्देश देते हुए दिखावा करने से बचने को कहा है | दूसरों से ईर्ष्या करने वाला या दूसरों की सम्पत्ति का हरण करने वाला कभी प्रसन्न नहीं रह सकता अत: मनुष्य को ऐसे कृत्यों से बचने का प्रयास करते रहना चाहिए | दान को सनातन धर्म में दान का बड़ा महत्व है परंतु यह भी कहा गया है कि जब दाहिना हाथ दान दे तो बाँयें को यह पता नहीं लगना चाहिए कि दाहिने हाथ ने क्या दिया ?? इन तथ्यों का पालन करके ही हमारे महापुरुषों / पूर्वजों का जीवन दिव्य से दिव्यतम बना |* *आज मनुष्य स्वयं को पूर्ण विकसित मानने लगा है | वेद / पुराणों का आधार लेकर चन्द्रमा तक की यात्रा करने वाले मनुष्य को आज सनातन धर्म के शास्त्र ही झूठे एवं अंधविश्वासी लगने लगे हैं | जिस गुरु का सानिध्य एवं विशेष प्रेम पा करके शिष्य जीवन में कुछ करने योग्य बनता है उसी गुरु का विरोध करके ही समाज में स्थापित होना चाह रहे हैं | शिष्य शायद यह भूल जाता है कि इन्हीं गुरु के सहारे हम यहाँ पहुँचे हैं | आज मनुष्यों के विचार कितने पवित्र हैं और उनके वचन कितने मधुर हैं यह बताने की आवश्यकता नहीं है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के सामाजिक परिवेश को देखकर यह कह सकता हूँ कि आज मनुष्य ईर्ष्या भाव से ओतप्रोत है | यदि पड़ोसी कुछ उन्नति कर रहा है तो आज का मनुष्य उस उन्नति को देख नहीं पाता है और किस तरह इसकी उन्नति बन्द हो यही सोंचकर दुखी रहता है | आज मनुष्य यदि दिन प्रतिदिन अवनति को प्राप्त कर रहा है तो इसका मुख्य कारण है कि आज हम अपने मूल स्रोत (सनातन धर्म की मान्यतायें व निर्देश) को भूलते जा रहे हैं | आज हम अपने नियम स्वत: बनाने लगे हैं | आज हम इस योग्य हो गये हैं कि भक्ति के साथ ही भगवान का भी प्रचार करने लगे हैं | आज आत्ममंथन करने की आवश्यकता है |* *सनातन धर्म की मान्यतायें किसी एक धर्म के लिए नहीं बल्कि मानवमात्र के लिए है | यह आज समझने की आवश्यकता है |*

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