बसों, ट्रेनों, बाज़ारों में क्यों बजाते हैं किन्नर अजीब ढंग से ताली ? जाने वजह

14 फरवरी 2019   |  अंकिशा मिश्रा   (338 बार पढ़ा जा चुका है)

बसों, ट्रेनों, बाज़ारों में क्यों बजाते हैं किन्नर अजीब ढंग से ताली ? जाने वजह

किन्नरों को ही हमेशा समाज में अलग ही नज़रों से देखा जाता है समाज में इतने बदलाव होने के बावजूद इन लोगों को वो सम्मान नहीं मिला जो मिलना चाहिए। आपने किन्नरों को कई जगह देखा होगा. कभी चौराहों पर तो कभी किसी ट्रेन में. तो कभी यूं ही बाज़ार में. पर शायद कभी इन्हें आम नज़रों से नहीं देखा होगा। हमेशा ही ओछी नज़रों से देखा होगा। हम आगे तो बढ़ रहे हैं पर कई मामलों में हमारी सोच बहुत पिछड़ी है और अगर आप बदलाव चाहते है तो आपको इस लेख के बाद ये पता चल जायेगा कि बदलाव कहाँ लाना है। एक कहावत है कि “सोच बदलो नज़र खुद-ब-खुद बदल जायेगा” कुछ ऐसे ही हमारे समाज की कुरीतियों को दूर करने के बारे में कहना गलत नहीं होगा।


किन्नर क्यों बजाते हैं अजीब ढंग से ताली ?


किन्नरों को कई लोग ओछी नज़रों से देखते हैं. उनके आस-पास होने से भी असहज महसूस करते हैं. ख़ैर आज हम उनके अधिकारों और उन पर हो रहे अत्याचारों पर बात नहीं कर रहे.

एक और सवाल, आप किन्नरों की पहचान कैसे करते हैं? कुछ लोग कहेंगे उनको देखकर पता चल जाता है और कुछ लोग कहेंगे उनकी ताली से.


The Hindu के एक लेख के मुताबिक, लोगों का ध्यान खींचने के लिए किन्नर ताली बजाते हैं. ज़्यादातर किन्रर निम्न आय वर्ग से आते हैं. अगर वे उच्च आय वर्ग से भी हों, तो भी उन्हें किसी का समर्थन नहीं मिलता. उनके परिवारवाले उन्हें 'असल रूप' में अपनाने से इंकार कर देते हैं. मकान मालिक उन्हें किराये पर मकान नहीं देते, स्कूल उन्हें Cross Dressing करने के लिए निकाल देता है और उन्हें कोई अच्छी नौकरी भी नहीं मिलती है. समाज की बेइज़्ज़ती से बचने का उनके पास कोई उपाय नहीं होता. वे समाज के हाशिये पर अपने जैसों के संग रहने पर मजबूर होते हैं.

किन्नर रंजीता कहती हैं,

'कई कारणों से मजबूर होकर और खु़द को अभिव्यक्त करने के लिए किन्नरों ने ये भाषा विकसित की.'





International Journal of Humanities And Social Science के मुताबिक हिजरों की ताली का मतलब है

'मैं जो हूं वो मैं हूं'

इस बार अर्ध्य कुंभ में किन्नड़ अखाड़ा ने अमरत्व स्नान किया. किन्नर अखाड़े की प्रमुख, लक्ष्मी नारायण त्रिपाठी का ताली के विषय में ये विचार है,

'ताली से समुदाय की तुरंत पहचान हो जाती है. अगर किन्नरों को समाज में सम्मान और अपना अधिकार चाहिए, तो सबसे पहले ताली को ही छोड़ना होगा.'

कुछ लोगों का मानना है कि किन्नरों की ताली कोई बुरी ख़बर लेकर आएगा या उसे सुनने से किसी भी व्यक्ति का बुरा होगा पर ये हक़ीक़त नहीं है. ताली महज़ बातचीत करने का एक ज़रिया है.


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