गुरु की भूमिका में हमारे धर्मग्रंथ :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

13 अक्तूबर 2019   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (421 बार पढ़ा जा चुका है)

गुरु की भूमिका में हमारे धर्मग्रंथ :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सृष्टि के आदिकाल में परब्रह्म के द्वारा वेदों का प्राकट्य हुआ | वेदों को सुनकर हमारे ऋषियों ने शास्त्रों की रचना की | उन्हीं को आधार मानकर हमारे महापुरुषों के द्वारा अनेकानेक ग्रंथों की रचना की गयी जो कि मानव मात्र के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका में रहे हैं | इन ग्रंथों का मानव जीवन में बहुत ही महत्त्व है | सनातन धर्म के ग्रंथ तब संसार में प्रचलित हुए जब संसार में न तो अन्य धर्म था और न ही धर्मग्रंथ | इन ग्रंथों का जीवन में क्या महत्त्व है इसे इस प्रकार समझा जा सकता है कि मनुष्य को अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए एक गुरु तथा मार्गदर्शक की जरूरत होती है | यह सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य गुरु की शरण में जाता है परंतु यह भी सत्य है कि ग्रंथ हमारे गुरु हैं | ग्रंथों से हम लोगों को बहुत कुछ सीखने को मिलता है | ग्रंथों से हमें अपने धर्म तथा अपनी संस्कृति के बारे में पता चलता है | ग्रंथों में लिखी हुई बातें हमें सही रास्ते पर चलने की शिक्षा देती हैं , सांसारिक ज्ञान के साथ साथ हमारे ग्रंथ हमें हमारे जीवन की वास्तविकता से भी परिचित कराते हैं जिसे जानकर हम मुक्ति भी प्राप्त कर सकते हैं | हमारे सनातन ग्रंथों में जीवन का अर्थ बताया गया है | हमारे धर्म ग्रंथों की जानकारी रखना सभी के लिए अनिवार्य है चाहे वह कोई भी हो किसी भी जाति का हो | हमारे धर्म ग्रंथों का ज्ञान ऐसी जानकारी कराता है जिससे हमें अपने कौशल तथा अपनी सोच का विकास करने का मौका मिलता है | ग्रंथों को पढ़कर प्राप्त हुए ज्ञान के माध्यम से हम अपने आप को एक जागरूक तथा जिम्मेदार नागरिक की तरह शिक्षित कर सकते हैं | ग्रंथों को पढ़ना तभी सार्थक हो सकता है जब हम उन्हें पढ़कर उनमें दी गयी सकारात्मक बातों को अपने जीवन में ढालने का प्रयास करें | धर्म ग्रंथ ही जीवन में एक सच्चे सद्गुरु की भूमिका निभाते हैं | ग्रंथों में अनर्गल कुछ भी नहीं लिखा है क्योंकि इन सभी ग्रंथों का आधार स्वयंभू वेद ही हैं , और वेद किसी के द्वारा लिखे न हो करके ईश्वर की वाणी मानी जाती है , और ईश्वर कभी भी अनर्गल नहीं बोल सकता | इसलिए इन ग्रंथों पर विश्वसनीयता बनाए रखते हुए उनमें बताई गई बातों को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए |*


*आज हम जिस युग में जीवन यापन कर रहे इससे कलियुग कहा जाता है , जहां असत्य एवं अनाचार का साम्राज्य है | ऐसे में हमारे धर्म ग्रंथों में भी सनातन धर्म को तोड़ने के उद्देश्य विरोधियों के द्वारा अनेक प्रकार के तथ्यों को अलग से जोड़ दिया गया है | जिससे एक सनातन धर्मी के हृदय में संशय की स्थिति उत्पन्न हो जाती है | ऐसी स्थिति में मनुष्य को चिंतन करना चाहिए | कभी-कभी यह स्थिति तब भयावह हो जाती है जब आज का आधुनिक मनुष्य अपने धर्म ग्रंथों का अध्ययन ना करके सब कुछ गूगल पर ही प्राप्त करना चाहता है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी' बताना चाहूंगा सनातन कि विरोधियों के द्वारा (मुगल काल से लेकर के अंग्रेजों के शासन तक ) सनातन के ग्रंथों में वर्णित कुछ श्लोकों के अर्थों का अनर्थ करके आम जनमानस के सामने प्रस्तुत किया गया | क्योंकि विदेशी आक्रांताओं ने यह जान लिया था कि भारत की समृद्धि का कारण सनातन ग्रंथ ही हैं | यहां सनातन ग्रंथों की इतनी मान्यता है कि लोग इसके विपरीत आचरण नहीं कर सकते हैं | इसी मानसिकता के साथ जितना आक्रमण हमारे देश के मंदिरों पर किया गया उससे कहीं ज्यादा सनातन के ग्रंथों के को भी लक्ष्य बनाकर के उसने ऐसे ऐसे तथ्यों का समावेश कर दिया गया जिससे आम जनमानस व आने वाली पीढ़ी भ्रमित हो जाए , और एक सनातनी होकर के भी सनातन का विरोध करने पर विवश हो जाए | इन तथ्यों को जान लेने के बाद एक सच्चे सनातनी को अपने धर्म ग्रंथ के ऊपर पूर्ण निष्ठा के साथ विश्वास करते हुए उनमें उत्पन्न संशय की स्थिति को अपने श्रेष्ठ पुरुषों के सामने रख कर के शंका का समाधान अवश्य कर लेना चाहिए , जिससे कि मस्तिष्क में भ्रम की स्थिति ना बनी रहे | ग्रंथ हमारे मार्गदर्शक थे , हैं और रहेंगे परंतु जिस प्रकार विद्युत का सकारात्मक उपयोग करने से वह घर में उजाला कर देती है परंतु जरा सी असावधानी से विनाश भी मचा देती है उसी प्रकार हमारे ग्रंथ जीवन में उजाला तो कर देते हैं परंतु भ्रम की स्थिति में यह मनुष्य को विक्षिप्त भी बना सकते हैं अतः सावधानी अपेक्षित है |*


*अपने धर्मग्रंथों में जब भी किसी विषय को लेकर संशय या अविश्वास की स्थिति में स्वयं की निर्णय क्षमता समाप्त हो जाय तो उस विषय को लेकर अपने धर्मगुरुओं / श्रेष्ठजनों के समक्ष उपस्थित होकर भ्रम का निवारण कर लेना ही श्रेयस्कर माना गया है |*

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