वृद्धाश्रम

05 जुलाई 2020   |  कल्पनाrms   (303 बार पढ़ा जा चुका है)

वृद्धाश्रम.....

पहले तो होते नहीं थे क्यूंकि पहले के वृद्ध खुद को वृद्ध समझते थे। आज के वृद्ध पहले जैसे नहीं रहे।पहले वृद्ध अपने नाती पोतों में व्यस्त होते थे।आज के बुजुर्ग फोन टीवी और लैपटॉप में।बदलाव आया है सबमें पहले के बुजुरगों को बच्चो की हर एक्टिविटी से मतलब होता था आज के बुज़ुर्ग को सिर्फ फोन चाहिए।वे गेम भी अब बच्चों के साथ नहीं फोन में खेलते दिखेंगे। बच्चे से लेकर बूढ़ा हर व्यक्ति वॉट्सएप और फेसबुक ट्विटर पर व्यस्त है क्या ऐसे पहले होता था।


इंटरनेट ने मानसिक और बौद्धिक अशांति फैला रखी है हर वर्ग के टकराव ने हमें हमारे अपनों से दूर कर दिया है।


बच्चे वृद्ध एक समान ये सब कहते हैं पर ऎसा होता नहीं है बच्चो को सोचने समझने की छमता नहीं होती इसलिए एक मां बाप चार बच्चो को पाल लेते हैं और जहां छमता विकसित हुई तो वो चार भी साथ नहीं रहते और जब वो चार साथ नहीं रहते तो आज के वृद्ध जिनमें अपार अहम भरा है वो कहां इनमें किसी के साथ एडजेस्ट कर पाते हैं।


समाज में आए तरह तरह के बदलाव के कारण ही हर वर्ग बदला है और बदलाव की देन है वृद्धाश्रम....
आज के कुछ बुजुर्ग तो धमकी देते है कि," किसी को कुछ नहीं देंगे सब कुछ दान देकर हम मजे से वृद्धाश्रम में रहेंगे"!


जब भारत में विद्याश्रम कम हॉस्टल प्रचलित हुआ तो ज्यादातर मां बाप को वही सुविधाजनक लगा बच्चें वहां से निकल स्वयं में व्यस्त हो गए उन्हें नहीं मिला परिवार का साथ... उन्होंने नहीं समझा परिवार का महत्व और प्रचलित हुआ एकल परिवार जिसने बढ़ावा दिया वृद्धाश्रम को।कुछ लोगों जबरन और कुछ स्वेच्छा से पर वृद्धाश्रम का सहारा लेना पड रहा है जो गलत है पर है आज का सच।


पहले घर की औरतें घर में होती थी आज वो घर बाहर सब संभालती है लोगो के सहयोग या अकेले कुछ सामंजस्य बिठाने में सफल हो जाती और कुछ असफल बड़े से लेकर बूढ़े सबको उसे ही देखना होता है।


अगर पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी का सहयोग करे तो शायद किसी को वृद्धाश्रम ना जान पड़े...।


बुढ़ापे का असली सहारा बहू होती है ना कि बेटा या बेटी ...उसको सम्मान दीजिए अपनी बेटी जैसा जब उसे आपसे अपने मां बाप का प्यार मिलेगा तो वो अपने मां बाप की तरह आपको भी कभी दुखी नहीं देखना चाहेगी।


अगली पीढ़ी को भी उनकी तपस्या को समझना चाहिए उन्होंने जीवन भर तपस्या अपनों के साथ के लिए किया है उन्हें सिर्फ उनके साथ की की जरूरत है
जिस प्रकार एक बच्चे के लिए उनके मां बाप का साया जरूरी होता है उसी प्रकार बुजुर्गों को अपनों के सानिध्य की जरूरत होती है।रोजी रोटी के चक्कर में कई बुजुर्ग अपने घर में अकेले रहते है....कुछ अपनों के साथ अपनों के बीच आज की भाग दौड़ में अकेले रहने को मजबूर है....कुछ जबरन तो कुछ अपने जैसे कुछ लोगो के साथ एक स्वस्थ जीवन की तलाश में वृद्धाश्रम की तरफ अपने कदम बढ़ा देते हैं ये कदम चाहे जिसके कारण हो पर है बहुत ग़लत....।


आज कल जिनके बच्चे नहीं होते उन्हें लोग गलत निगाह से देखते हैं बांझ कहते हैं बे औलाद कहते है उन्हें सुन कर् बड़ी तकलीफ होती है पर उससे ज्यादा तकलीफ तब होती है जब कोई वृद्धावस्था में ये कहता है कि,


"कोख सूनी नहीं है हमारी पर जिंदगी वीरान है"
अपनों के साथ रहिए अपनों के हाथ रहिए
बदलते हुए माहौल में थोड़ा सा खुद को बदलिए
वृद्धाश्रम उनके लिए हो जिनके कोई ना हो
जिनके अपने हैं वो अपनी के साथ हो..... ।"

धन्यवाद🙏🙏🙏


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आलोक सिन्हा
06 जुलाई 2020

अच्छा उपयोगी लेख है |

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