गुम इंसान की आप बीती...

10 जुलाई 2020   |  एंटोनी जोसफ   (297 बार पढ़ा जा चुका है)

गुम इंसान की आप बीती...







गुम इंसान की आप बीती...


मानव तस्करों के जाल से

ऐसे मुक्ति मिली दीपक को.....


दीपक गवरे पिता प्रेमलाल गवरे नामक मजदूर अंतत: अपने परिवार में वापस तो आ गया लेकिन अपने गुम होने के करीब बीस -बाईस दिन उसने कैसे बितायें यह एक दिलचस्प कहानी है. गुम इंसान की खोज लाश दिखाकर-इस शीर्ष से इस साल के शुरू में दीपक के अचानक घर से गायब होने व उसके परिवार को पुलिस द्वारा लावारिस लाश दिखाकर यह पूछने कि क्या यह लाश दीपक की है? पुलिस प्रवृत्ति उजागर हुई थी किसी को मालूम नहीं था कि आखिर दीपक के साथ क्या हुआ? गुम कैसे हुआ और कहां गया? गुम होने से लेकर उसके वापस आने तक की एक दिलचस्प किन्तु दिल दहला देने वाली कहानी है....संपूर्ण घटना की शुरूआत दीपक के घर से होती है जहां उसकी पत्नी से पैसे को लेकर झगड़ा होता है और घर से निकलकर कहीं चला जाता है. अक्सर ऐसा होता था लेकिन इस बार दो दिन तक भी दीपक वापस नहीं आया तो परिवार में चिंता बढ़ गई.पत्नी और बेटे ने पुलिस में कम्पलेन्ट की लेकिन कोई एफआईआर दर्ज नहीं हुआ.हां पुलिस खोजबीन करती रही.कोई अज्ञात लाश मिलती तो परिजनो को थाने बलाकर लाश स्थल पर ले जाते और उनसे शिनाख्त करने को कहते यह सिलसिला बराबर कुछ दिनों तक चलता रहा.असल में दीपक का पत्नी से झगड़ा राशन के लिये रखे पैसे को दीगर काम के लिये खर्च करने को लेकर हुआ था. झगड़े के बाद दीपक घर से निकल गया.गुस्से मे दो दिन तक रायपुर के टाटीबंद गुरू द्वारे के बाहर बैठा रहा. यहां अन्य कई लावारिस आकर रात बिताते हैं, इन्हीें के बीच से उसकी मुलाकात एक प्लास्टिक बीनने वाले से हुुई एक दूसरे का दुखड़ा बताते हुए दोनों में दोस्ती हो गई. उसने उसे पैसा कमाने का नुस्खा बताया और उड़ीसा में किसी से मिलवाने और वहां से कहीं अन्य स्थान पर जाकर अच्छा पैसा कमाने की बात कही..घर से भागने के बाद दोनों उडीसा के काटाभांजी पहुंचे यहां से यह लोग विशाखापटनम गये. रायपुर से साथ गये व्यक्ति ने उसकी मुलाकात एक बिहारी युवक से कराई जो तेलगू बोलना भी जानता था इस व्यक्ति ने उन्हें बताया कि वह एक स्थान पर उन्हें ले जायेगा जहां वह एक दिन में पांच सौ रूपये कमा सकता है.यह व्यक्ति दीपक व उसके साथी को लेकर आन्ध्रा के ही एक अन्य स्थान पर लेकर गया जिसके बारे में वह कहता है कि उसे बताया गया कि इस स्थान का नाम राजमुदरी है. यहां उनकी एक अन्य व्यक्ति से मुलाकात हुई. यह व्यक्तिे सिर्फ तेलगू जानता था उसने इन लोगों की खूब आवभगत की तथा अच्छी नौकरी और पैसा दिलाने का आश्वासन दिया. यह लोग रातभर उसके साथ रहे और बहुत प्यार से उनके साथ बात करता रहा. दूसरे दिन एक पिक वेन पहुंची उसमें उन्हें बिठाया गया. इस वेन में कहीं बाहर झांकने के लिये तक कोई सुराख नहीं था साथ में और भी कुछ लोग बैठे थे. यहां से उन्हें एक ऐसे स्थान पर ले जाया गया जो एक टापू था जिसके आसपास का पूरा क्षेत्र सुनासान -यहां तक पहुंचने के लिये सिर्फ नाव ही एक साधन जिसके जरिये यहां पहुचा जा सकें . उन सभी को यहां पहुंचाने के बाद उसमें से सिर्फ तेलगू जानने वाले किसी से फोन पर बात की. वह व्यक्ति दीपक के अनुसार करीब आठ बजे पहुंचा तो उसके साथ आजू- बाजू में दो बंदूकधारी भी थे. वहंा इनसे तेलगू में कहा गया कि ठीक से काम करना है. वहां उनको मोटी मोटी नारियल की रस्सी और जाल दिया गया तथा झींगा मछली पकडऩे के काम में लगाया गया. रोज घंटो काम कराते थे, जिसने काम में थोड़ी बहुत भी लापरवाही की उसकी पिटाई पैर की एड़ी में डंडों से की जाती थी. सिर्फ दो घंटे का ब्रेक मिलता.पैसे भी नहीं देते थे. पहने हुए कपड़ों का भी बुरा हाल हो गया था. इस दर्दनाक जिंदगी में इन्होंने कई दिन निकाल दिये.कुछ सामान लेने के लिये दीपक को भी साथ ले जाया गया तो उसने वहां से भागने का रास्ता भी खोज लिया.उसने अपने मित्र को भी वहां से भागने में उसका साथ देने का अनुरोध किया लेकिन वह यह जोखिम उठाने तैयार नहीं थे. वहीं के एक बुजुर्ग से दीपक ने जानकारी ली तो पता चला कि यहां जो भी आया वह यहां से भाग नहीं पाया या तो वह यहीं पड़ा मर गया. मरने के बाद उसे समुन्द्र में फेक दिया जाता है. भागने वालो की यह लोग हत्या भी करने से भी नहीं चूकते. इस स्थिति के बाद भी दीपक ने यहां से अकेले भाग निकलने की योजना बनाई और चुपचाप उस स्थान से निकलकर फिर उसी स्थान पर पहुंच गया जहां से उसे इस क्षेत्र में ले जाया गया था. उसने वहां किसी से मराठी- हिन्दी में बात कर आगे ट्रेन से जाने का रास्ता पूछा. जिस व्यक्ति से पूछा उसने कहा तुम ट्रेन या बस से गये तो उनके आदमी तुम्हें पकड़ लेेंगे व किसी प्रकार तुम वापस नहीं जा पाओगे.उस व्यक्ति ने उससे सारे कपड़े बदलने और अगर कपड़े नहीं है तो सिर्फ टावल लपेटने की बात कही. जब उसने ऐसा किया तो वह पूरी तरह एक भिखारी दिख रहा था लेकिन दीपक ने उनसे बचने के लिये यही रास्ता चुना और पैदल ही चलने का फैसला किया. रास्तों से न जाकर खेत- खेत ही अपना सफर शुरू किया. यह खेत गन्ने के थे जिसमें कटने के बाद उसके ठूट लगे थे. चलते चलते बुरा हाल हो गया. किसी प्रकार नागपुर पहुंचा यहां पटरियों पर घूमते समय उसके परिचितों में से किसी ने उसे पहचान लिया जिसकी मदद से वह अपने तुमसर स्थित घर पहुंचा.वहां वह किसी से बात करने की स्थिति में नहीं था. इस पूरे मामले से यह स्पष्ट हो गया कि कतिपय लोग इसंान को बहकाकर ऐेसे गर्त में ले जाते हैं जहां उनका पूरा जीवन संकट में पड़ जाता है. रायपुर पुलिस ने दीपक के परिवार को ताकीद दी थी कि दीपक जब भी लोटे तो उसे थाने में उपस्थिति देने को कहे लेकिन दीपक ने पुलिस से मिले पूर्व अनुभवों व अपने परिवार के साथ पुलिस के व्यवहार के चलते पुलिस से मिलना और किसी प्रकार की जानकारी देना उचित नहीं समझा. दीपक इस समय परिवार के साथ है, खुश है लेकिन पुलिस कभी यह पता लगाने नहीं पहुंची कि वह वापस आया कि नहीं!


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