देवोत्थानी एकादशी :- आचार्य अर्जुन तिवारी

24 नवम्बर 2020   |  आचार्य अर्जुन तिवारी   (461 बार पढ़ा जा चुका है)

देवोत्थानी एकादशी :- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म की प्रत्येक मान्यता स्वयं में गौरवशाली है | सृष्टि का संयोजन एवं इसकी गतिशीलता यद्यपि ईश्वर के हाथों में है परंतु मानव मात्र की सहायता के लिए हमारे विद्वानों ने वर्ष , मास एवं दिन , बारह राशियों , २७ नक्षत्रों एवं सूर्य चंद्रमा के आधार पर काल विभाग किया है | समस्त संसार को प्राण एवं ऊर्जा प्रदान करने वाला सूर्य इस सृष्टि के लिए आवश्यक आवश्यकता है | बारह राशियों पर भ्रमण करने वाले सूर्य का प्रत्येक राशि का महत्व भिन्न होता है | इसी प्रकार जब सूर्य आषाढ़ शुक्ल एकादशी को मिथुन राशि पर आता है तब सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार चतुर्मास्य का प्रारंभ होता है | आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान श्री हरि विष्णु निद्रा मगन हो जाते हैं और उनकी निद्रा चार महीने तक अनवरत चलती है | यही चार महीने चतुर्मास्य कहे गए हैं | मनुष्य का प्रत्येक कार्य ईश्वर को साक्षी मानकर किया जाता है और जब पारब्रह्म परमेश्वर (ईश्वर) श्री हरि विष्णु निद्रामग्न हो जाते हैं तो कोई भी शुभ कार्य किसे साक्षी मानकर किया जाय ? यही ध्यान में रखते हुए इन चार महीनों में सभी शुभ कार्यों को वर्जित किया जाता है | विवाह , यज्ञोपवीत , दीक्षा ग्रहण , यज्ञ , गृह प्रवेश , गोदान , प्रतिष्ठा एवं अन्य सभी शुभ कार्य इसीलिए वर्जित हो जाते हैं कि जब भगवान श्री हरि निद्रा मगन है तो किसकी साक्षी मानकर कि यह कार्य फलीभूत होंगे | चार महीने की निद्रा के बाद कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को (अर्थात आज) भगवान श्री हरि निद्रा का त्याग करके चैतन्य होते हैं | इसीलिए कार्तिक मास शुक्ल पक्ष की एकादशी को देवोत्थानी , देवउठनी , हरि प्रबोधिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है | आज के दिन ही भगवान श्री हरि विष्णु निद्रा का त्याग करके जगत के पालनकर्ता के पद पर पुनः आरूढ़ हो जाते हैं और चार महीने से बंद पड़े सारे शुभ कार्य प्रारंभ हो जाते हैं |*



*आज समस्त विश्व की भांति हमारा देश भारत भी आधुनिकता की चपेट में है | आधुनिकता का यह हाल है कि आज हम अपनी सांस्कृतिक मान्यताओं को भूलते चले जा रहे हैं | आज का मनुष्य पौराणिक , वैदिक एवं प्राचीन मान्यताओं को रूढ़िवादिता एवं ढकोसला कह कर के उन से पीछा छुड़ाना चाहता है | अपने पूर्वजों के द्वारा बनाई गई मान्यताएं आज के मनुष्य को व्यर्थ लगती हैं | जहां एक और विवाहादि सारे शुभ कार्य चातुर्मास्य में वर्जित माने जाते हैं वही आज इसी चातुर्मास्य में अनेक विवाह होते हुए देखे जा सकते हैं , जिसका परिणाम यह होता है कि वैवाहिक जीवन कलह पूर्ण होते हुए संबंध विच्छेद की स्थिति तक पहुंच जाते है | आज ऐसा होता प्राय: देखा भी जा रहा है | मैं "आचार्य अर्जुन तिवारी" आज के लोगों को और उनके द्वारा किए जा रहे मनमाने ढंग के कार्यों को देख कर तनिक भी आश्चर्यचकित नहीं होता हूँ क्योंकि जो लोग अपने पूर्वजों को नहीं मानना चाहते हैं उनके द्वारा पूर्वजों की बनाई गई मान्यताएं कितनी मानी जाएंगी यह स्वयं में विचारणीय है | अपने पूर्वजों की बात को न मानकर आज का मनुष्य अनेकों प्रकार के दुख उठा रहा है परंतु "हम आधुनिक हो गए हैं" कहता हुआ थोथी हंसी हंसने का प्रयास करता है | आज का मनुष्य अपनी मूल संस्कृति को छोड़कर विदेशों की ओर आशा भरी दृष्टि से देखता है वह शायद यह भूल रहा है कि विदेशों ने सारा ज्ञान हमसे ही अर्जित किया है | सनातन की मान्यताएं आज समस्त विश्व मानने को तैयार है परंतु दुखद है कि हमारे ही देशवासी विशेष कर सनातन धर्मीअपनी ही मान्यताओं से किनारा कर रहे हैं | ध्यान देना चाहिए कि आज देव उठनी एकादशी के दिन प्रत्येक मनुष्य को भगवान श्री हरि विष्णु की मूर्ति के सामने या उनके मंदिर में होना चाहिए क्योंकि ऐसी मान्यता है कि जब भगवान निद्रा का त्याग करते हैं तब उनकी दृष्टि जिन भक्तों पर पड़ती है उनका मोक्ष हो जाता है | देव उठनी एकादशी के दिन मनुष्य जो भी दान करता है उसे स्वर्ग में वही वस्तु उपभोग करने के लिए प्राप्त होती है | यह दिव्य मान्यताएं सनातन धर्म में ही देखने को मिल सकती हैं |*


*अपने पूर्वजों के द्वारा बनाए गए नियम एवं मान्यताओं को ना मानकर के आज का मनुष्य सुखी तो नहीं है परंतु संसार को दिखाने के लिए खोखली हंसी अवश्य हंस रहा है | अपनी मान्यताओं को ना मानने का ही कारण है आज सनातन धर्मी तेज हीन होता चला जा रहा है |*

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