तृण धरि ओट कहती वैदेही

06 मई 2021   |  शोभा भारद्वाज   (419 बार पढ़ा जा चुका है)

तृण धरि ओट कहती वैदेही

तृण धरी ओट कहती वैदेही

डॉ शोभा भारद्वाज

कोरोना काल में सभी भयभीत हैं ऐसे में संकट मोचन हनुमान ही सहारा हैं .

रावण जगा उसने प्रभात के सूर्य को अपनी लाल आँखों से देखा सबसे पहले कैद में रखी गयी सीता का रुख किया उसके पीछे उसकी रानियाँ उंघती हुई आ रही थी , बगल में मन्दोदरी हीरों से जड़ित सोने के पात्र में मदिरा लिए रावण के साथ चल रही थी रावण धीरे –धीरे पात्र से मदिरा के घूंट भर रहा था रावण के पीछे श्रेणी के अनुसार योद्धा चल रहे थे हनुमान ने छोटा आकार धारण कर शीशम की सबसे ऊँची डाली में पत्तों के बीच अपने आप को छुपा लिया उन्होंने देखा मानव जाति की अपूर्व सुन्दरी स्त्री उठी वह पास ही एक पेड़ के नीचे खाली धरती पर लेटी थी उठ कर बैठ गयी वहीं उसने अशोक के वृक्ष से पीठ टिका कर अपने वस्त्रों से अपने आप को ढक कर ,बाजुओं से अपने घुटनों को जकड़ कर सिर झुका लिया . उनके लम्बे घने काले बाल खुल कर धरती पर फैल गये हनुमान समझ गये यह मानवी सीता है जब पुष्पक विमान से रावण हर कर उनको लेजा रहा था वह करुण स्वर में विलाप करती हुई उसका उग्र विरोध कर रही थीं .यह स्त्री अधमरी भूखी प्यासी ऐसी बंदनी थी जिन्हें मुक्ति की आशा नहीं है बंद आँखों से काल की प्रतीक्षा कर रही हैं सीता , श्री राम की भार्या हर वक्त अपने पति के साथ प्रसन्न रहने वाली अब दुःख का मूर्त रूप थी .

वहाँ रावण आया वह सीता को देख कर मुस्कराया ,अरे सीता तुम मुझसे भयभीत क्यों हो मैं तो तुम्हारे प्रेम का वशीभूत याचक हो चुका हूँ कब तक उपवास रखती हुई धरती पर सोओगी यह यौवन एवं सुन्दरता चिर स्थायी नहीं है मेरा प्रणय निवेदन स्वीकार कर मेरी महारानी बन कर लंका पर राज करो . सीता ने एक तिनका उठा कर कहा ऐ दुष्ट मेरी ओर देखना मुझे छूना मृत्यू को निमन्त्रण देना है क्या तुम देवी काली का नृत्य करता संहारक रूप नहीं जानते जिनके गले में मुंडों की माला है वह अट्टहास करती साक्षात कालरात्रि बन जाती है रावण की भौहों पर बल पड़ गये मेरा प्रताप देख देवता मेरी सेवा करते हैं मेरी विशाल सेना मेरे एक इशारे पर काल बन जाती है स्वयं काल मेरी कैद में है , ऐ मानव जाति की श्रेष्ठतम सुन्दरी मेरा प्रणय निवेदन स्वीकार कर मेरी पत्नि बन कर मेरी वैभव पूर्ण नगरी ,मेरे हृदय पर राज करो . सीता ने बिजली की तरह कड़कती आवाज में कहा रावण तुम्हें सब कुछ उलटा सूझ रहा है क्योंकि मृत्यू तुम्हारे पास खड़ी है यदि तुम सचमुच वीर हो धर्म का आचरण कर मुझे सम्मान के साथ श्री राम को लौटा दो वह नर श्रेष्ठ मर्यादा पुरुषोत्तम तुम्हें क्षमा कर देंगे, कभी शरणागत की हानि नही करेंगे नहीं तो ऐ रावण मौत की आहट सुन. ओह सीता जिद छोड़ो अपनी आँखे खोल कर मेरी ओर देखो लंका का सम्पूर्ण वैभव तुम्हारा होगा . सीता ने कहा अरे मूर्ख तू सूर्य के प्रकाश को बेचना चाहते हो मैं महाराजाधिराज जनक की पुत्री तुम मुझे वैभव का लोभ दिखा रहे हो? मूर्ख पागल हो? मेरे लिए धरती का हर वैभव मेरे स्वामी के साथ है तू चोरों की तरह मुझे हर लाया है .श्री राम जिन्होंने पिता के बचन का पालन करने हेतु बनवासी वेश में वन को प्रस्थान किया मूर्ख तू उन आर्य श्रेष्ठ को क्या जाने ? अरे सीता जितना मैं तुम्हारे प्रति दयालू हूँ तुम उतना भी मुझे अपमानित कर रही हो .सीता ने उत्तर दिया तो जान लो मैं सीता हूँ धरती पुत्री ,धरती अपनी धुरी पर घूमती है लेकिन जब हिलती है कितने राजवंश ,सभ्यतायें तुझ जैसे उसमें समा जाते हैं .

रावण ने क्रोध से सीता को देखा वह अपने असली रूप में आ गय वह दसों सिर झटकने लगा उसकी सभी भौहें चढ़ गयीं उसकी बीसों भुजाये फड़कने लगीं वह गुराया दांतों को पिसते हुए तलवार लेकर सीता पर झपटा सीता डरी नहीं उन्होंने रावण के नेत्रों में अपने तेजस्वी नेत्र गड़ा दिए .वृक्ष पर बैठे हनुमान रावण पर झपटने ही वाले थे मन्दोदरी ने रावण को रोक लिया वह प्रेम सहित उसे समझा बुझा कर साथ ले गयी जाते –जाते रावण ने धमकी देते हुए कहा एक माह ,बस एक माह का समय दे रहा हूँ यदि तूने मेरा कहा नहीं माना मैं अपनी कृपाण से तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दूंगा .रावण की पत्नियाँ देव व महान राजाओं की पुत्रियाँ आँखों में आंसू भर कर सीता को निहारती लौट गयीं उनके पीछे अनेक प्रहरी थे . हनुमान सोचने लगे यहाँ सीता असहाय अकेली है राक्षसों से भरे दंडक वन में विचरती थी ऐसे महान योद्धा राम की पत्नी जिसने एक ही बाण से बाली के प्राण हर लिये रावण की बंदिनी . वीभत्स राक्षसियाँ लौट आयीं वह सीता को डराने लगी तभी एक समझदार राक्षसी त्रिजटा ने उन्हें रोकते हुए कहा मैने भोर के समय स्वप्न देखा है . सोने की लंका जल रही है ,लंकापति लाल वस्त्रों लाल फूलों की माला पहने तेल पी रहा है वह हंसा, चीखा फिर रोता हुआ दक्षिण दिशा की ओर जा रहा था उसके जाते ही लंका समुद्र में डूब गयी .राक्षसों की सफेद हड्डियों के पहाड़ पर लक्ष्मण बैठे हैं , श्री राम आये वह सफेद हाथी पर सवार थे जिसका हौदा हाथी दांत का बना था वह उस पर रखे सिंहासन पर बैठे हैं उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण किये हैं उनके गले में श्वेत फूलों की माला है . लंका का सौभाग्य भयभीत होकर कन्या के वेश में उत्तर दिशा की और जा रहा था कन्या के शरीर पर घाव थे ,रक्त बह रहा था एक बाघ उसकी रक्षा कर रहा था वह अवश्य अयोध्या नगरी की और जा रही थी उन्होंने सीता से कहा तुम सौभाग्यवती हो तुम पर कोई भी अशुभ छाया नही है . राक्षसियाँ डर गयीं वह सीता से क्षमा प्रार्थना करने लगी हमारी रक्षा करो राम के कोप से रक्षा करना.

सीता अब अकेली थी हनुमान सोच रहे थे क्या करू कैसे सीता को विश्वास दिलाऊं वह राम के सेवक है उन्हीं की खोज में लंका आये हैं हनुमान जानवरों की भाषा में राम राम जपने लगे सीता नें सिर उठाया सुनने लगी हनुमान ने नर्म आवाज में सीता के हरण के बाद की कथा सुनाई कैसे नर और बानर का साथ जुड़ा राम ने एक ही बाण से महान बाली का वध कर किश्किंध्या का राज महाराज सुग्रीव को सौंप दिया अब चारों दिशाओं में जहाँ तक हवायें पहुंचती है बानर भालू उन्हें ढूंड रहे हैं .मैं भगवती की खोज में समुद्र पार कर यहाँ पहुँचा हूँ . सीता ने ऊपर देखा शीशम के पेड़ पर सफेद रंग का वानर बैठा मुस्करा रहा था उसकी पीली भूरी आँखे चमक रही थीं हनुमान एक छलांग में नीचे आ गये . माँ मैं हनुमान श्री राम को समर्पित उनका सेवक हूँ . सीता की आँखों से टपटप आँसू बहने लगे उन्होंने सिर झुका लिया वह समझ गयीं उनके सामने विशुद्ध आत्मा खड़ी है वह हनुमान के हर भाव को समझ रही थीं हनुमान ने कहा जब रावण आपको हर कर ले जा रहा था आप विलाप कर रही थीं आपने अपने आभूष्ण फेके थे वह पोखर में गिर गये मेरे मित्र सुग्रीव ने उठा कर सम्भाल लिये .जब श्री राम ऋष्यमूक पर्वत पर पधारे हमने आपके आभूष्ण उन्हें दिये . हनुमान प्रसन्न होकर किलकारी मारने लगे उनकी खोज पूरी हुई है हनुमान ने सीता की राम की निशानी अंगूठी उन्हें दिखाई . हनुमान ने कहा माता राम कम सोते हैं बहुत कम खाते हैं ठंडी रातें उन्हें जलाती हैं उनकी आँखों से निरंतर अश्रू बरसते है .माँ आप कृपया मेरी पीठ पर बैठ जाईये मैं आपको सकुशल यहाँ से निकाल कर ले जाऊँगा .

सीता मुस्कराईं मैं तुम वानरों का चंचल स्वभाव समझ गयी तुम इतने छोटे हो मुझे कैसे ले जा सकते हो .हनुमान का स्वरूप बढ़ता गया ऐसा लगा जैसे विशाल श्वेत पर्वत आकाश को छू रहा हो विशाल भुजायें उनके हर भाव से वीर रस टपक रहा था उन्होंने तुरंत लघु रूप धारण कर लिया माँ मैं आपको लंका से ले जाउंगा मुझे कोई दीवार ,रावण की सेना भी रोक नहीं सकेगी मैं पवन पुत्र हूँ .सीता संतुष्ट हुई उन्होंने अपना सिर ऊपर उठाया वह आत्म विश्वास से भर गयीं .मुझे विश्वास है एक दिन श्री राम आयेंगे रावण का वध कर मुझे जीत कर ले जायेंगे पुत्र हनुमान आज ठहरो मेरा यहाँ कोइ नहीं है तुम्हें देख कर संतोष हुआ न जाने तुम फिर कब लौटोगे समुद्र से घिरी लंका में प्रवेश बहुत कठिन है . हनुमान ने उन्हें सांत्वना देते हुये कहा माता मैं तो महाराज सुग्रीव की सेना का साधारण वानर हूँ श्री राम भयानक वानरों भालुओं की सेना सहित समुद्र में सेतु बांध कर पधारेंगे रावण को उसके कृत्य दंड देंगे हनुमान मौन सोच रहे थे वह ऐसा क्या करें जिससे लंका में ऐसा हाहाकार मच जाये राक्षस राज युद्ध से पहले ही भयभीत हो जाये .

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