अभिभावक बनें बच्चों के सहयोगी और दिशा निर्देशक

28 मई 2018   |  नीरू मोहन'वागीश्वरी'   (84 बार पढ़ा जा चुका है)

अभिभावक बनें बच्चों के सहयोगी और दिशा निर्देशक

लेख **अभिभावक बनें बच्चों दोस्त और दिशा निर् देश क** अभिभावक के रूप में हम सभी बहुत निष्ठुरऔर स्वार्थी होते हैं । बच्चे पास हुए नहीं कि हम सभी अपनी-अपनी सोच अभिलाषाएँ उन पर डाल देते हैं । माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे वही बने जिसका सपना उन्होंने देखा है यहाँ पर आकर हम इतने स्वार्थी हो जाते हैं कि हम यह जानने की कोशिश ही नहीं करते कि हमारे बच्चे की रूचि किसमें है, वह क्या करना चाहता है, क्या बनना चाहता है ? बस, हमें यही उम्मीद रहती है कि अच्छे अंक लाए डॉक्टर, इंजीनियर, सॉफ्टवेयर इंजीनियर या और किसी अन्य सम्मानित पद के लिए अपनी पढ़ाई को आगे बढ़ाएँ । क्या इस प्रकार का व्यवहार करके हम अपने बच्चों की उम्मीदों और कैरियर के आगे तो नहीं आते ? क्या पता बच्चे की रुचि किसी और कार्य क्षेत्र में हो वह कुछ और बनना चाहता हो जैसे…डांसर, सिंगर, पेंटर इत्यादि । आपने कभी अपने बच्चों के साथ बैठकर उनकी इच्छा पूछी है…नहीं, क्योंकि हम बस यही चाहते हैं कि हमारा बच्चा जो हम उसे बनाना चाहते हैं वही बने । हम जबरदस्ती उस पर अपनी इच्छाएँ और उम्मीदें थोप देते हैं जिसका परिणाम यह होता है कि वह दो राही बन जाता है एक तरफ उसके स्वयं के सपने होते हैं और दूसरी तरफ माँ-बाप के सपने । उसके लिए चुनाव करना मुश्किल हो जाता है अगर हम स्वयं को उनकी जगह रख कर देखें तो शायद यह स्थिति पैदा ही न हो । हमें अभिभावक होने के नाते बच्चों के साथ बैठकर उनके भविष्य की भूमिका उन्हीं से लिखवानी है । उनकी रुचि उनका रुझान जानना है और उनके विचारों के साथ एकमत होकर उन का मार्ग प्रशस्त करना है न कि अपनी इच्छाएँ और अभिलाषाओं को उन पर थोपकर उनके मार्ग का बाधक बन उन्हें जीवन के पथ पर छोड़ देना है जहाँ उन्हें सिर्फ़ अंधेरा, दबाव और पराधीनता का बोध हो । हमें उन्हें उनके विचारों और सोच के साथ अपनाकर उन्हें स्वतंत्र छोड़कर उनके सही दिशा निर्देशक की भांति उनके साथ चलना है तभी हम अपने बच्चों के लिए मजबूत स्तंभ साबित हो सकते हैं जहाँ उन्हें मुश्किलों से पार उतारने का हौंसला प्राप्त हो सके । अभिभावक के रूप में हमें अपने बच्चों के हर फैसले का सम्मान और स्वागत करना होगा । उनकी रुचि को लेकर आगे बढ़ना होगा और अच्छे पालनकर्ता का फर्ज़ निभाना होगा । यह समय बहुत ही कीमती है देश का भविष्य इन्हीं बच्चों से है । इस समय जब वह अपने आने वाले जीवन की रूपरेखा का निर्माण कर रहें हैं इन्हें सही दिशा निर्देश और सहयोग की जरूरत है जो उन्हें अपने माँ-बाप से ही मिल सकता है । इस समय बच्चों के मित्र बनें जिससे वह अपने मन की बात आपको बता सकें । हमें बच्चों के साथ माँ-बाप, सहयोगी, दोस्त और एक निर्देशक की भूमिका निभानी है तभी हम भविष्य में उनके सपनों को पूर्ण करने में कामयाब हो सकते हैं । हमारे बच्चों के सपने ही हमारे सपने हैं यही हमें सोचना है न कि हमें अपने सपनों को पूरा करवाने के लिए उन्हें एक बंधवा मज़दूर बनाना है । सपने वही सच होते हैं जो अपने होते हैं उन्हें उनके सपनों के साथ जीने का मौका दें क्योंकि अपने सपने ही सच होते हैं दूसरों के सपने तो कहानी बनकर ही रह जाते हैं तो आप अपने बच्चों के सपनों को कहानी न बनने दें बल्कि साकार रूप दें और उनके हर उचित फैसले का सम्मान करें और अनुचित फैसलों को उचित और सही रूप प्रदान कर उनके समक्ष प्रस्तुत कर उनके सहयोगी बनें । लेखिका नीरू मोहन 'वागीश्वरी'

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