ऐ भाई ज़रा देखके चलो

20 जुलाई 2018   |  डॉ पूर्णिमा शर्मा   (118 बार पढ़ा जा चुका है)

ऐ भाई ज़रा देखके चलो

ऐ भाई ज़रा देखके चलो

ये कौन सा मुक़ाम है, फ़लक नहीं ज़मीं नहीं

के शब नहीं सहर नहीं, के ग़म नहीं ख़ुशी नहीं

कहाँ ये लेके आ गई हवा तेरे दयार की ||

गुज़र रही है तुमपे क्या बनाके हमको दर-ब-दर

ये सोचकर उदास हूँ, ये सोचकर है चश्मे तर

न चोट है ये फूल की, न है ख़लिश ये ख़ार की ||

पता नहीं ऊपर वाले के दयार की हवा सदी के महान कवि श्री गोपालदास नीरज जी को भी कहाँ उड़ा ले गई | वो नीरज जो दिल की शायरी से ग़म का नग़मा लिखकर ख़त की शक्ल में रवाना कर देते थे ताकि हज़ारों रंग के नज़ारे उस ख़त से खिल उठें | लेकिन शायद उस ऊपरवाले को भी ज़रूरत महसूस हुई होगी कि कोई उसके लोक में आकर हर किसी को सावधान करने के लिए पुकारे “ऐ भाई ज़रा देखके चलो...”

जीवन दर्शन को गीतों में ढालने वाला नीरज जी के जैसा महान गायक कभी मरता नहीं, अपने गीतों के रूप में जीवन के यथाथ से सबको परिचित कराता सदा के लिए अमर हो जाता है...

विनम्र श्रद्धांजलि उस महान आत्मा को... उन्हीं की पंक्तियों के साथ...

है प्यार हमने किया जिस तरह से उसका न कोई जवाब

ज़र्रा थे लकिन तेरी लौ में जलकर हम बन गए आफ़ताब

हमसे है ज़िन्दा वफ़ा और हमही से है तेरी महफ़िल जवाँ

हम जब न होंगे तो रो रो के दुनिया ढूँढेगी मेरे निशाँ

https://youtu.be/pzWNlUduP_Q

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रेणु
25 जुलाई 2018

आदरनीय आलोक जी-- आपकी पीड़ा पगी पंक्तियों से आपके आहत मन का पता चलता है | भग्यशाली हैं आप कि आपने उनका सानिध्य प्राप्त किया| बहुत सुखद है कि आप भी उन्ही की तरह गीतों में महारत रखते हैं और आपके गीत पढ़कर मुझे यही लगा आप नीरज जी की परछाई हैं | मेरा सौभाग्य है कि इस अद्भित मंच पर आपकी रचनाएँ पढ़ पायी | हमेशा कोई दुनिया में नहीं रहता पर एक संतोष नीरज जी के बारे में जरुर है कि हर आमोखास ने उन्हें सम्मान दिया और सरकार ने भी उन्हें अनदेखा नहीं किया | ये कवि समाज के लिए बहुत सुखद है | सादर

आलोक सिन्हा
20 जुलाई 2018

बहुत आहत हूँ | बड़े भाई थे | सन 1950 से बुलंदशहर घर आते जाते थे | इस द्वार क्यों न जाऊं उस द्वार क्यों न जाऊं घर पा गया तुम्हारा मैं घर बदल बदल कर | यह गीत उनहोंने हमारे घर पर ही लिखा था | हुआ ये कि व ह उस दिन सुबह 5 बजे ट्रैन से बुलंदशहर आये | सर्दी के दिन थे | हमारे घर के आस पास सभी घर एक से नक्शे से बने हैं | जिससे वह अँधेरे मैं घर नहीं पहचान सके | इस तरह कभी किसी घर को हमारा घर समझ लेते कभी किसी घर को | काफी देर जब सफलता नहीं मिली तो उनहोंने फिर बड़े विनोद भाई साहब का नाम द्वार द्वार पर पुकारा तो मां की आँखें खुल गईं और वह फिर उन्हें बुला कर अंदर ले आई | वास्तव में वे अभूतपूर्व प्रतिभा थे | कैरम बहुत अच्छी खेलते थे | खाने में मटठा बहुत पसंद था | मैंने ठीक से दही चलाना उन्हीं से सीखा | आज उनकी सेंकड़ों यादें मन में हैं | पर मैं बिखरे मन को संग्रह नहीं कर पा रहा हूँ | मन शांत हो जाने पर पूरा संस्मरण ही लिखूंगा |

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