भारत एक विश्वगुरु

14 सितम्बर 2019   |  pradeep   (7131 बार पढ़ा जा चुका है)

हम मानते है कि भारत विश्वगुरु था. और हमें फिर से विश्वगुरु बनना है. सबसे अच्छी बात ये है कि इस के लिए कोई भी देश प्रतिस्पर्धा में नहीं है. सभी देश अपनी अर्थव्यवस्था को बढ़ाने , अपने वैज्ञानिक स्तर को ऊँचा उठाने, अपनी जनता को खुशहाल बनाने में लगे है. अमेरिका और चीन दुनियाँ की सबसे बड़ी ताकत बनने की होड़ में है, रूस पिछड़ ज़रूर गया है इस रेस में लेकिन कोशिश अभी भी ज़ारी है. ऐसे में सिर्फ भारत ही सोच सकता है विश्वगुरु बनने की, ओर अब हम उस और बढ़ चले है. हमें दुनियां को बताना है कि आज जिस विज्ञान की दुनियां बात करती है वो विज्ञान तो हज़ारो साल पहले हमारे यहाँ विकसित होकर लुप्त भी हो चुका था . गणेशजी की प्लास्टिक सर्जरी, कर्ण का स्टेमसेल से जन्म, सीता का टेस्ट ट्यूब से पैदा होना, पुष्पक विमान, टेलीविज़न, इंटरनेट, मेल, सभी कुछ था, महाभारत में तो परमाणु बम तक थे. आज हमारे पास ये सब नहीं है क्योकि जो असली वेद थे जिनमे इन सबका ज़िक्र है वो चोरी हो गए और गोरे लोगों ने हमारे उस विज्ञान से ये सब फिर से बना दी. हमे तो वो असली वेद भी वहां से वापिस लाने है, हमारे पास जो वेद है वो नकली है फिर भी हम उन नकली वेदो का सम्मान भी करते है और पूजते भी है. जब हम भगवान की मूर्ति बनाकर पूजा कर सकते है तो हम नकली वेद भी पूज सकते है, यही तो विशेषता है हमारे देश की, 60 के दशक में एक देशभक्त ने गाना भी गाया था , इतना आदर इंसान तो क्या पत्थर भी पूजे जाते है, जहाँ राम अभी तक है नर में नारी में अभी तक सीता है, इसका विश्वास तो हमें करना ही पड़ेगा क्योकि नारी को तो अभी भी अग्नि परीक्षा देनी पड़ती है और पति जब चाहे अपने स्वार्थ के लिए त्याग सकता है. इसके तो उदाहरण बताने की भी ज़रूरत नहीं है. जब ये सब कुछ हमारे पास है तो हमे कौन रोक सकता है विश्वगुरु बनने से? यहाँ एक सवाल पैदा होता है कि भारत कब और क्यों विश्वगुरु था? हम तो ज्ञान किसी विदेशी को देते नहीं थे? क्योकि विदेशी तो शूद्र होते थे और शूद्रों को ज्ञान नहीं दिया जाता था, अगर चोरी छिपे वो ज्ञान अर्जित भी कर ले तो उसकी ऊँगली काट ली जाती थी, श्राप देदिया जाता था, ऋषि शम्बूक को तो मार ही दिया गया था. तो हम उस वक्त विश्व को कौन सा ज्ञान बाट रहे थे? वेदों को पढ़ने की अनुमति सिर्फ ब्राह्मणों को थी, विदेशी ब्राह्मण नहीं हो सकते क्योकि ब्राह्मण तो जन्म से होता है , ऐसे में उनको ज्ञान दिया ही नहीं जा सकता था, तभी तो शायद उन्होंने हमारे वेद चुरा लिए होंगे. उन्होंने चोरी से हमारा ज्ञान अर्जित किया है इसलिए वो श्राप के अधिकारी है, हमे उन्हें ज्ञान नहीं श्राप देना चाहिए. भारत में तो श्राप से मौत हो जाती है, एक साध्वी ने श्राप दिया तो पाकिस्तान से आंतकवादियों ने आकर पुलिस अफसर को मार दिया? फिर आज तक हमने इस विद्या का प्रयोग क्यों नहीं किया? ऐसा करते तो हमे पाकिस्तान से युद्ध करने के लिए करोड़ों-खरबों रुपए खर्च नहीं करने पड़ते. भारत को विश्वगुरु का दर्ज़ा हिंदुत्व से नहीं बल्कि बौद्ध धर्म से मिला, जिसने दुनिया में शान्ति का सन्देश पहुंचाया. बौद्ध धर्म जन्म से नहीं होता कोई भी उसे मान सकता है और बौद्ध भिक्षुक बन सकता है, जहा जाति नहीं है, इसलिए विदेशी भी बोधिसत्व प्राप्त कर सकते है. आज भारत में ही बौद्ध धर्म खत्म हो गया, और वो भी इस्लाम और ईसाई धर्म के आने से पहले. आज जो बौद्ध भारत में है वो नवबौद्ध कहलाते है जिसकी शुरुवात बाबा भीमराव आंबेडकर ने की. लद्दाख या पहाड़ी इलाको में बौद्ध धर्म तिब्बत से आया. जिस विचार धारा और जिस धर्म के कारण हम विश्व गुरु बने उसे हमने ही नष्ट कर दिया. राजा हर्षवर्धन के ज़माने तक पुरे भारत में लाखों की तादाद में बौद्ध मठ थे उन्हें किसने नष्ट किया? करोड़ों की तादाद में बौद्ध धर्म को मानने वाले थे वो कहाँ लुप्त हो गए? कौन से आंतकवादियों ने उन्हें नष्ट कर दिया? आज हम फिर से विश्वगुरु बनना चाहते है , एक भीड़तंत्र से, हिंसा से, रक्त से रंगे हाथों से? बौद्ध धर्म की एक छोटी सी कहानी है जिसे जापान में हर साल सितम्बर महीने की पूर्णमासी को बताया जाता है चाँद में एक छवि दिखती है जिसे एक खरगोश की छवि माना जाता है , कहानी है कि एक बार एक भिक्षु जंगल से गुजर रहा था उसे भूख लगी तो उसने वहां के जानवरों से खाने को माँगा , सभी जानवरों ने कुछ ना कुछ दिया जो भी उनके पास था, जब एक नन्हे से खरगोश से माँगा तो उसने आग जलाई और कहा कि मेरे पास तो देने को कुछ नहीं है लेकिन मैं इस आग में कूद जाता हूँ और जब मेरा मांस भून जाए तो उसे खा कर अपनी भूख मिटा लेना, यह कह कर नन्हा खरगोश आग में कूद गया , वो भिक्षु कोई और नहीं स्वयं अमिताभ बुद्ध थे जो कलयुग के बुध से भी लाखो साल पहले हुए थे, उस खरगोश को बोधिसत्व प्राप्त हुआ और उस खरगोश की आकृति हमेशा के लिए चाँद पर बन गई, ये प्रेम भाव, ये त्याग की भावना ,अपनों या अपने धर्म के लिए नहीं सभी प्राणियों के लिए हो ऐसी सोच या विचार धारा ही विश्वगुरु बना सकती है. नफरत, हिंसा से हम दुश्मन बना सकते है, दुश्मन बन सकते है गुरु नहीं. (आलिम)

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