वैष्णव जन तो ते नर कहिये पीर पराई जान रे ( स्वच्छता अभियान )

03 अक्तूबर 2019   |  शोभा भारद्वाज   (8173 बार पढ़ा जा चुका है)

वैष्णव जन तो ते नर कहिये पीर पराई जान रे  ( स्वच्छता अभियान )

वैष्णव जन तो ते नर कहिये पीर पराई जान रे (स्वच्छता अभियान )

डॉ शोभा भारद्वाज

महात्मा गाँधी जी की 150 वीं जयंती के अवसर पर सूर्या संस्थान नोएडा में आयोजित सर्वधर्म समभाव गोष्ठी के अवसर पर विभिन्न धर्म गुरु के भाव पूर्ण प्रवचनों को सुनने का अवसर मिला | सफाई कर्मचारियों द्वारा तैयार जलपान सबने गृहण किया एवं उन्हें सम्मानित किया गया |

स्वर्गीय महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती के अवसर पर अनेक कार्यक्रमों के अवसर पर स्वच्छता अभियान पर भी जोर दिया गया महात्मा गांधी साफ़ सफाई को ईश्वर की भक्ति के बराबर मानते थे वह ऐसे स्वच्छ भारत का स्वप्न देखते थे जिसमें सभी नागरिक मिल कर सफाई अभियान चलायें |गाँधी जी वह जहाँ भी जाते लोगों को समझाते जब तक आप अपने हाथ में झाड़ू और बाल्टी नहीं उठाओगे तब तक आपके आसपास की गंदगी इसी तरह बढ़ती रहेगी | विक्टोरिया क्रास पाने में जितने साहस की जरूरत है सफाई रखने के लिए उतने ही साहस की जरूरत है | 76 वर्ष की आयु में वह बड़े गर्व से कहते थे मुझे सफाई से कोई परहेज नहीं हैं मैं स्वयं साफ़ सफाई करता हूँ चाहो तो मेरा भी बहिष्कार कर दो| सफाई कर्मचारियों को सिर पर मेला ढोते देख कर उन्हें आत्मिक कष्ट होता था एक अंग्रेज ने उनसे पूछा यदि एक दिन के लिए आपको वायसराय बना दिया जाए आप क्या करेंगे उन्होंने कहा राजभवन के आस पास की बस्तियों को साफ़ करूंगा यदि दुबारा फिर से बना दिया आगे की बस्तियाँ साफ़ करूंगा |दक्षिण अफ्रिका की जेल में एक बार उन्होंने अपनी मर्जी से शौचालयों की सफाई का काम किया दुबारा फिर जब वह जेल गये जेल अधिकारियों ने उन्हें यही काम सौप दिया |
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने स्वच्छता अभियान से जोड़ने के लिए जाने माने समाज के जाने माने महानुभावों पत्र लिख कर सफाई अभियान का हिस्सा बनने के लिए आमंत्रित किया है सभी उत्साह पूर्वक अभियान का हिस्सा बने |आज से पहले अधिकतर आम लोगों को अपने घर के बाहर कूड़ा करकट साफ़ करने में शर्म आती थी लेकिन जब बड़ी हस्तियों और देश के प्रधान मंत्री के हाथों में झाडू देखा उनका संकोच दूर हो गया यदि किसी दिन सफाई कर्मचारी नहीं आता है घर की गृहणी अपने घर के बाहर सीढ़ियों और खुले हिस्सों को स्वयं गर्व से साफ़ कर लेती हैं |अब भारत में सिर पर मेला ढोने की प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है सस्ते सुलभ शौचालयों का चलन बढ़ रहा हैं | गांधी जी के प्रयत्नों का परिणाम हैं मोदी जी ने उनके इसी स्वप्न को पूरा करने के लिए स्वच्छता को अभियान का रूप दिया है घरों में सुलभ शौचालय युद्ध स्तर पर बनवाये गये है |

झुग्गी बस्तियों के निवासियों को वहा से हटा कर 26 गज के प्लाट दिए गये जिनमें लैट्रिन के लिए गड्डा तैयार कर उसके उपर पॉट फिट था जहाँ शौचालय बन सके जब यह बस्तियाँ बसीं बाशिंदे ने सबसे पहले पॉट को निकाल कर फेक दिए और गड्ढे को पाट कर दो कमरे का घर बना लिए शौचालय उनके हिसाब से जगह की बर्बादी थी , हाथ में लोटा लेकर खुले स्थानों पर गंदगी फैलाते कई बार दिलचस्प नजारा देखने को मिलता हैं सूट का कोट पहने पैंट कंधे पर रखे किसी के दामाद महोदय पानी की बोतल लिए खुले स्थान को खोजते दिखाई देते थे | कुछ ने छत पर जरा सी आड़ कर शौचालय बना कर गंदगी सीधी घर के बाहर की नाली में डाल देते यदि घर के सामने से नाला गुजरता है उसकी मजबूत पटरी को तोड़ कर प्लास्टिक की पाईप के सहारे नाले में सीधी गंदगी डाल देते है| अब दबाब देकर उनसे शौचालय बनवाये गये उन्हें सीवर से जोड़ा गया पब्लिक को सीवर के ढक्कन पर छेदों से जिससे गैस निकलनी जरूरी है उससे बदबू आती थी अच्छे नागरिकों ने उस पर सीमेंट चढ़ा दी | अपने घर की नाली के लिए कौन सीवर डिपार्टमेंट जाए इसलिए खुद ही सीवर का ढक्कन तोड़ कर उसमें अपने घर की नालियां जोड़ देते है टूटे ढक्कन में रास्ते चलते लोग थैली में कूड़ा साल कर फेक देते हैं इस तरह सीवर बंद हो जाते हैं उससे आस पास के घरों की दीवारे और फर्श सीलने लगे घर में बू आने लगती है इससे पहले सीवर का पानी घर में आये सीवर डिपार्टमेंट में शिकायत की जाती है डिपार्टमेंट काफी मुस्तैद था वह सीवर की सफाई भी कर जाते हैं अंदर से निकली गंदगी और कूड़े का ढेर बन गया सीवर का सही ढक्कन भी लगा देते हैं परन्तु ढक्कन के छेद बंद करने पर उन्होंने ऐतराज किया फिर खुद ही छेद खोल गये जबकि छेद बंद करना अपराध है |क्या करे छेद बंद करने वाला गरीबी की दुहाई देने लगेगा आजकल दिल्ली में एक अमोघ शस्त्र चलता है हम गरीब आदमी हैं |

देहातों में मोदी जी का कृत संकल्प है हर घर में शौचालय होना चाहिए इसे ग्राम वासी मुश्किल से स्वीकर कर रहे हैं उन्हें समझाया जा रहा है घर में शौचालय का न होना महिलाओं के लिए कितना कष्टदायी हैं उनका नित्यकर्म के लिए जाना सुबह सबेरे या शाम को अन्धेरा होने के बाद ही सम्भव हो सकता है कई बार महिलायें या नाबालिग बच्चियाँ हादसों का शिकार हो जाती हैं |महिलाये भय से पानी नहीं पीती घर में कोई व्यवस्था नहीं है इससे पेशाब संबंधित कई बिमारियों से कष्ट पाती हैं | अब महिलाएं जागरूक हो चुकी है वह दबाब दे रहीं है उनके लिए घर में शौचालय सबसे जरूरी हैं सरकार भी विज्ञापनों द्वारा जन समाज को जागरूक कर रही है |

देश इतनी तरक्की कर चुका है आज भी गटर के सफाई कर्मचारी बंद नालों ,गटरों एवं सीवरों की सफाई के लिए खतरा उठाते हैं कई बार सीवरों में उठने वाली गैस उनकी मृत्यू का कारण बनती है उनको बचाने का प्रयत्न करने वाले भी नहीं बच पाते कितना अमानवीय है गटर में गंदगी से लथपथ होकर काम करना इन्हें बदन पर सरसों का तेल मलवा कर गटरों में उतार दिया जाता है |यह अधिकतर दिहाड़ी मजदूर हैं इनकी और बहुत कम ध्यान दिया जाता है यह अनेक बिमारियों के शिकार होकर असमय मर जाते हैं जरूरत हैं ऐसे उपकरणों की जिनकी सहायता से सीवरों की गंदगी निकाली जा सके | नालों में लोग कूड़े के साथ कांच पटक जाते हैं कूड़ा पानी के बहाव को रोकता है सफाई के दौरान कई बार कांच के टुकड़े के सफाई के लिए उतरे सफाई कर्मी के पैर में घुस ज़ाते हैं बहता खून और पैरों से चिपकी गंदगी कितना कष्ट दायक है अपने घर का कूड़ा ठिकाने लगाने के आतुर कभी परिणाम के बारे में नहीं सोचते | आरक्षण का लाभ भी इनके बच्चों को नहीं मिलता आरक्षण का लाभ उठाये लोगों के बच्चों तक ही सीमित हो रहा है |क्योंकि यदि बच्चे पढ़ाई में यदि पिछड़ जाते हैं पढ़ने से बचने लगते हैं | छोटे बच्चों को सही अक्षर ज्ञान कराना , उन विषयों पर ख़ास ध्यान देना जिन विषयों में बच्चे पिछड़ रहे हैं उन्हें पढ़ाई से होने वाले स्वर्णिम भविष्य के लिए उत्साहित करना सच्चे अर्थों में गांधी जी एवं बाबा साहेब अम्बेडकर जी का स्वप्न पूरा होगा | नहीं तो गरीब सफाई कर्मियों के बच्चों की हालत वैसी ही बनी रहेगी |

लोग ज्यादा ही समझदार हैं जमीन पर कब्जा करना नही छोड़ते घर के बाहर तीन फुट की दो दीवारे उठा कर उस पर लेंटर डाल कर एक प्लेटफार्म बना लेते हैं | जबकि सामने से सरकारी नाली गुजरती है उस प्लेट फार्म पर रसोई घर बना लेते हैं बाकी जगह धूप सकने या बैठने के काम आती हैं कईयों नें बिना नक्शे के पांच मंजिल तक घर बना कर नाली ढक कर के ऊपर से सीढ़िया चढ़ा ली हैं आठ फुट की सड़क को तो दोनों तरफ के निवासी चाहते हैं उस पर छत बना कर अपने कब्जे में ले लें| कहीं से नाली ढकी कहीं खुली, उसमें भी कूड़ा प्लास्टिक की बोतले और चप्पलें पड़ी रहती हैं सफाई कहाँ से हो, पूरी भरी हुई नालियों में से गंदा पानी बहता है लोगों की चप्पले जूते भीगते रहते है | जनता ब्लाकों का हाल और भी खराब है मकान के मालिक नाली पर पत्थर या लेंटर डाल कर उसे ढक देते हैं उस पर से आगे बढ़ कर आधी सड़क पर कब्जा कर एक कमरा निकाल लेते हैं पहली मंजिल पर रहने वाले सरकारी सड़क पर पिलर लगा कर उस पर छत डाल कर आगे और छज्जा निकाल लेते हैं | सब पुलिस और नगरपालिका के कर्मचारियों को पुजापा चढ़ा कर होता है |सड़क इतनी छोटी कर देते हैं जब बारिश आती है नाली से पानी कैसे निकले छत का पानी कहाँ जाये पानी घरों में भरने लगता है |गालियाँ सरकार को दी जाती है पानी के निकास के बारे में जब जमीन घेरी कभी नही सोचा बरसात में पानी कहाँ से निकलेगा | नाले ढकने के लिए मजबूत लेंटर डाले गये है पानी के निकास के लिए मजबूत रास्ते भी बनाये गये परन्तु पहले निकास के रास्ते पर ईटें रख कर रास्ता बंद कर देते है उन्हें बदबू आती है फिर कूड़ा डालना शुरू हो जाता हैं बरसात आती है सडकों में पानी से भर जाता है राहगीर कितने परेशान होते है यह वही जानते हैं| कुछ अच्छे नागरिक पानी से भरी सडकें देख कर और राहगीरों की परेशानी देख समझ कर निकास का मुहं खोलते हैं तब जाकर पानी निकलता है बरसात से पहले नगरपालिका भी नालों के मुहँ खुलवाकर कूड़ा निकलवाती है परन्तु कूड़ा वहीं पड़ा रहता है जनता की ओर से लापरवाही शुरू हो जाते है | किसी को अपने घर के आसपास कूड़ा दान नहीं चाहिए एक तो कूड़ा उठता ही नहीं है चारो तरफ गंदगी फैली रहती है जानवर कूड़े में मुहँ मार कर चारो और फैला देते हैं मक्खियाँ भिनभिनाती रहती हैं |इससे बचने के लिए कूड़ेदान को ही लोग हटवा देते हैं अब कूड़े का क्या हो? किसी के भी घर के बाहर कूड़ेदान को उल्ट जाते हैं| कुछ लोग हर महीनें पैसा लेकर कूड़ा उठाने का काम करते हैं वहीं सफाई नजर आती है | आजादी के बाद हमें हर बात की शिकायत सरकार से होती हैं सरकार हमारी ही बनाई हुई हैं देश भी हमारा है |

हर व्यक्ति की इच्छा शक्ति से ही साफ़ सफाई रह सकती हैं | हमें सोचना है अपने परिवेश को साफ़ सुथरा बनाने के लिए हम क्या करें? और हम क्या करते हैं हम सब जानते हैं स्वच्छ परिवेश स्वास्थ्य के लिए लाभ कारी है | अब भारत में सिर पर मेला ढोने की प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है सस्ते सुलभ शौचालयों का चलन बढ़ रहा हैं यह गांधी जी के प्रयत्नों का परिणाम हैं मोदी जी ने उनके इसी स्वप्न को पूरा करने के लिए स्वच्छता को अभियान का रूप दिया है |

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