श्राद्ध की आवश्यकता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भारतीय संस्कृति में जन जन का यह अटूट विश्वास है कि मृत्यु के पश्चात जीवन समाप्त नहीं होता | यहां जीवन को एक कड़ी के रूप में माना गया है जिसमें मृत्यु भी एक कड़ी है | प्राय: मृत व्यक्ति के संबंध में यह कामना की जाती है कि अगले जन्म में वह सुसंस्कारवान तथा ज्ञानी बने | इस निमित्त जो कर्मकांड संपन्न



जीवित्पुत्रिका व्रत :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में व्रत व त्यौहारों को मनाने का विशेष एक महत्व व एक विशेष उद्देश्य होता है | कुछ व्रत त्यौहार सामाजिक कल्याण से जुड़े होते हैं तो कुछ व्यक्तिगत व पारिवारिक हितों से | आश्विन मास के कृष्ण पक्ष में जहां पितर शांति के लिये श्राद्ध पक्ष मनाया जाता है तो वहीं शुक्ल पक्ष के आरंभ होते ही आदिशक



महालक्ष्मी पूजा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म इतना बृहद एवं विस्तृत है कि इसके विषय में जितना जानने का प्रयास करो उतनी ही नवीनता प्राप्त होती है | सनातन धर्म के संपूर्ण विधान को जान पाना असंभव सा प्रतीत होता है | जिस प्रकार गहरे समुद्र की थाह पाना एवं उसे तैरकर पार करना असंभव है उसी प्रकार सनातन धर्म की व्यापकता का अनुमान लगा पाना



श्राद्ध में दुर्गुणों का त्याग आवश्यक :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में प्रत्येक व्यक्ति के लिए अपने पितरों का श्राद्ध तर्पण करना अनिवार्य बताया गया है | जो व्यक्ति तर्पण / श्राद्ध नहीं कर पाता है उसके पितर उससे अप्रसन्न होकर के अनेकों बाधाएं खड़ी करते हैं | जिस प्रकार प्रत्येक व्यक्ति के लिए श्राद्ध एवं तर्पण अनिवार्य है उसी प्रकार श्राद्ध पक्ष के कुछ न



पितरों को श्राद्ध की प्राप्ति :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में पितरों के लिए श्राद्ध की अनेक विधियां बताई गई हैं , इन सभी विधियों में सबसे सरल दो विधि बताई गई है :- पिंडदान एवं ब्राह्मण भोजन | मृत्यु के बाद जो लोग देवलोक या पितृलोक में पहुंचते हैं वह मंत्रों के द्वारा बुलाये जाने पर उन लोकों से तत्क्षण श्राद्घदेश में आ जाते हैं और निमंत्रित ब्



दान की परिभाषा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*दान की परिभाषा:-----**द्विहेतु षड्धिष्ठानाम षडंगम च द्विपाक्युक् !* *चतुष्प्रकारं त्रिविधिम त्रिनाशम दान्मुच्याते !!**अर्थात :-- “दान के दो हेतु, छः अधिष्ठान, छः अंग, दो प्रकार के परिणाम (फल), चार प्रकार, तीन भेद और तीन विनाश साधन हैं, ऐसा कहा जाता है ।”**👉 दान के दो हेतु हैं :--- दान का थोडा होना



श्राद्ध के अधिकारी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में मनुष्य की अंतिम क्रिया से लेकर की श्राद्ध आदि करने के विषय में विस्तृत दिशा निर्देश दिया गया है | प्रायः यह सुना जाता है पुत्र के ना होने पर पितरों का श्राद्ध तर्पण या फिर अंत्येष्टि क्रिया कौन कर सकता है ? या किसे करना चाहिए ?? इस विषय पर हमारे धर्म ग्रंथों में विस्तृत व्याख्या दी ह



श्राद्ध की सरलतम विधि :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में पितृऋण से उऋण होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को समय समय पर विशेष रूप से श्राद्घपक्ष (पितृपक्ष) में अपने पितरों के लिए तर्पण , श्राद्ध / पिंडदानादि करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया है | बिना श्राद्ध / तर्पण किये व्यक्ति सुखी नहीं रह सकता तथा पितृदोष से ग्रसित हो जाता है | वैसे तो हमारे ध



अनुशासन :-- आचार्य अर्जुन तिवारी

*मानव जीवन ही नहीं सृष्टि के सभी अंग - उपांगों मे अनुशासन का विशेष महत्व है | समस्त प्रकृति एक अनुशासन में बंधकर चलती है इसलिए उसके किसी भी क्रियाकलापों में बाधा नहीं आती है | दिन – रात नियमित रूप से आते रहते हैं इससे स्पष्ट है कि अनुशासन के द्वारा ही जीवन को सार्थक बनाया जा सकता है | विचार कीजिए कि



समुद्रमन्थन का रहस्य :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारे सनातन ग्रंथों में एक कथानक पढ़ने को मिलता है जो समुद्र मंथन के नाम से जाना जाता है | देवताओं एवं दैत्यों ने अमृत प्राप्त करने के लिए मन्दाराचल को मथानी एवं वासुकि नाग को रस्सी बनाकर समुद्र का मन्थन किया | अथक परिश्रम से मन्थन करने के बाद समुद्र से अमृत निकला परंतु अमृत निकलने के पहले समुद्र स



अनन्त चतुर्दशी :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म में मानव कल्याण के लिए अनेकों व्रत विधान की एक लंबी श्रृंखला है जो कि जो मानव जीवन के कष्टों को हरण करते हुए मनुष्य को मोक्ष दिलाने का साधन भी है | इसी क्रम में भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को "अनंत चतुर्दशी" का व्रत किया जाता है | भगवान श्री हरि विष्णु को समर्पित है यह व्रत | अनन्त अर्



पयोव्रत एवं वामन अवतार :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*सनातन धर्म ने मानव जीवन में आने वाली प्राय: सभी समस्याओं का निराकरण बताने करने का प्रयास अपने विधानों के माध्यम से किया है | नि:संतान दम्पत्ति या सुसंस्कृत , सदाचारी सन्तति की प्राप्ति के लिए "पयोव्रत" का विधान हमारे शास्त्रों में बताया गया है | दैत्यराजा बलि के आक्रमण से देवता स्वर्ग से पलायन करके



समय को पहचानें :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस धरती पर मनुष्य को अनेक मूल्यवान संपदायें प्राप्त हुई हैं | किसी को पैतृक तो किसी ने अपने बाहुबल से यह अमूल्य संपदायें अपने नाम की हैं | संसार में एक से बढ़कर एक मूल्यवान वस्तुएं विद्यमान हैं परंतु इन सबसे ऊपर यदि देखा जाए तो सबसे मूल्यवान समय ही होता है | समय ही मानव जीवन का पर्याय है , मनुष्य क



समय की प्रबलता :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस सृष्टि में ईश्वर का विधान इतना सुंदर एवं निर्णायक है कि यहां हर चीज का समय निश्चित होता है | इस धरा धाम पर सृष्टि के आदिकाल से लेकर के अब तक अनेकों बलवान , धनवान तथा सम्पत्तिवान हुए परंतु इन सब से भी अधिक बलवान यदि किसी को माना जाता है तो वह है इस समय | समय के आगे किसी की नहीं चलती है | इस सृष्ट



संतान सप्तमी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*हमारा भारत देश एवं उसकी संस्कृति इतनी दिव्य एवं अलौकिक है यहां नित्य कोई ना कोई पर्व , कोई न कोई व्रत मनाया कि जाता रहता है | हमारे ऋषि - महर्षियों ने मात्र के कल्याण के लिए जीवन के सभी क्षेत्रों में इतने विधान बता दिये हैं कि शायद ही कोई ऐसा दिन हो जिस दिन कोई व्रत - उपवास , पर्व - त्यौहार ना हो



अधम शरीरा :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*इस समस्त सृष्टि में जहां अनेकों प्रकार के जीव भ्रमण करते हैं जलचर , थलचर , नभचर मिला करके चौरासी लाख योनियाँ बनती है | इन चौरासी लाख योनियों में मानव योनि को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए हमारे धर्मग्रंथ इस पर अनेकों अध्यात्म वर्णन करते हुए दृष्टिगत होते हैं | प्रायः सभी धर्मग्रंथों में इस मानव शरीर को द



ब्रह्महत्या के दोष से बचाती है ऋषि पंचमी :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*चौरासी लाख योनियों में सबसे अधिक बुद्धिमान , विवेकवान , ऐश्वर्यवान , संपत्तिवान अर्थात सर्वगुण संपन्न होने के बाद भी मनुष्य को गलतियों का पुतला कहां गया है | यहां जाने अनजाने में मनुष्य से नैतिक एवं अनैतिक गलतियां होती रहती हैं | यदि मनुष्य से गलतियां होती रहती है तो उसका प्रायश्चित करने का विधान



कलंक चतुर्थी का रहस्य :--- आचार्य अर्जुन तिवारी

*भारत देश पर्व एवं त्यौहारों का देश है , यहाँ प्रतिदिन कोई न कोई पर्व , उत्सव एवं त्यौहार मनाकर आम जनमानस खुशियाँ मनाता रहता है | अभी विगत दिनों छ: दिवसीय "श्रीकृष्ण जन्मोत्सव" का पर्व धूमधाम से मनाने के बाद आज भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी से पूरे देश में अनुपम श्रद्घा एवं विश्वास के साथ दस दिवसीय विघ्न वि



नर समान नहिं कवनिउ देही :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*यह संसार बड़ा ही विचित्र है | इस पृथ्वी पर रहने वाले अनेक जीव है जो कि एक से बढ़कर एक विचित्रताओं से भरे हुए हैं | इन सभी जीवों में सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य सबसे ज्यादा विचित्र है | मनुष्य की विचित्रता का आंकलन इसी से किया जा सकता है कि यदि मनुष्य से यह प्रश्न कर दिया जाय कि इस संसार में सबसे दुर



वृक्ष है तभी संसार है :---- आचार्य अर्जुन तिवारी

*आदिकाल से ही हमारे ऋषियों ने प्रकृति के महत्व को समझते हुए प्रकृति पूजा का विधान बनाया था | उस विधान को मान करके हमारे पूर्वजों ने प्रकृति पूजा प्रारंभ की | प्रकृति में वैसे तो अनेकों प्रकार की नदियां पहाड़ एवं अन्य प्रतीकों की पूजा होती रही है परंतु इन सब में सबसे विशेष है वृक्ष एवं वनस्पतियों की



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