महाबलीपुरम में दो प्राचीन संस्कृतियों का मिलन आपसी रिश्तों की मजबूत कड़ी साबित होगा

19 अक्तूबर 2019   |  शोभा भारद्वाज   (429 बार पढ़ा जा चुका है)

महाबलीपुरम में दो प्राचीन संस्कृतियों का मिलन आपसी रिश्तों की मजबूत कड़ी साबित होगा

महाबली पुरम में दो प्राचीन संस्कृतियों का मिलन आपसी रिश्तों की मजबूत कड़ी साबित होगा ?

डॉ शोभा भारद्वाज

तमिलनाडू की राजधानी चेन्नई से 60 किलोमीटर दूर महाबलीपुरम प्राचीन ऐतिहासिक शहरों में से एक ,बंगाल की खाड़ी के किनारे स्थित प्राचीन बन्दरगाह था |सातवीं सदी में इसकी स्थापना पल्लव वंश के शक्ति शाली राजा नरसिंह वर्मन प्रथम ने धार्मिक उद्देश्य से कर वातापी कोंड़, मामल्ल की उपाधि धारण की थी इसी लिए यह शहर मामल्लपुरम नाम से जाना जाता है आजकल इसे महाबली पुरम भी कहते हैं |इस शहर का 2000 वर्षों से भी अधिक चीन से पुराना रिश्ता है दोनों देशों के बीच आयात निर्यात समुद्र के रास्ते होता था,व्यापारिक ही नहीं रक्षा सम्बन्ध भी थे | यहाँ पुरातत्व विभाग को चीन ,पर्शियन और रोम के सिक्के मिले हैं ग्रीस नाविक यहाँ अपने जल पोत खड़े करते थे | पल्लव वंश के शासनकाल में चीनी यात्री ह्वेनसांग कांचीपुरम आये थे उनकी यात्रा के व्रतांत में शहर का नाम आता है| नरसिंह बर्मन द्वितीय के शासन काल में उनका एक प्रतिनिधि मंडल चीन गया था चीन का एक प्रतिनिधि मंडल उनसे मिला जिसके पास सिल्क के वस्त्र पर लिखा संदेश था जिसमें उनको तिब्बत की सीमा से सटे दक्षिण चीन का जरनल नियुक्त किया गया था | उस समय के राजतन्त्र की विशेषता थी वह दक्षिण चीन के रक्षक बने लेकिन वहाँ अपनी सत्ता का प्रसार कर उसे अपने राज्य का अंग नहीं बनाया| चीनी बौद्ध यात्रियों के लिये नागपट्टिनम् में एक विहार निर्मित करवाया था ।

चीन एवं तमिलनाडू के बीच लंबे समय तक संबंध बना रहा इतिहासकारों के अनुसार पल्लव वंश के साथ शुरु हुआ चीन के साथ रिश्ता चोल वंश तक चला यही नहीं आयात निर्यात में तमिलनाडू ,तमिलनाडू के दूसरे बन्दरगाह नागापट्टिनम और तंजोर बन्दरगाह अहम हैं नरसिंह वर्मन द्वितीय ने महाबलीपुरम में मन्दिरों का निर्माण करवाया यह मन्दिर अधिकतर शैव परम्परा के हैं यहाँ का समुद्र तट पर स्थित शोर आठवीं शताब्दी पूर्व का है भगवान शिव के दो मन्दिरों के बीच में विष्णु मन्दिर का निर्माण कराया गया था | पल्लवों द्वारा ग्रेनाइट के ब्लॉकों का उपयोग कर इस शानदार संरचना का निर्माण द्रविड़ शैली में किया गया है। यहाँ के प्रसिद्ध पंच रथ मंदिर में पाँचों रथों का नाम महाभारत काल के पात्र पांडवों के नाम से रखा गया था प्रवेश द्वार पर द्रोपदी रथ जो भगवती दुर्गा को समर्पित है अन्य रथों से छोटा है , धर्मराज रथ ,भीमरथ ,अर्जुन तरह एवं नकुल सहदेव बौद्ध स्तूप के आकार के रथ हैं यह गुफा मन्दिर 7 वीं शताब्दी के अंत में पल्लवों द्वारा निर्मित किया गया एक रॉक काट कर बनाये गये मंदिर है। गणेश रथ मंदिर पल्लव वंश द्वारा एक चट्टान काट कर खूबसूरती से निर्मित किया गया दर्शनीय मंदिर है जिसकी रचना द्रविड़ शैली में की गई हैं | महाबली पुरम में एक पहाड़ को काट कर नों गुफा मन्दिर में काट छांट कर विभिन्न कथाओं के चित्र आज भी सजीव लगते हैं |पल्लव वंश के शासको के समय के अभिलेख संस्कृत में हैं |

चीन को याद दिलाने के लिए उनके एवं जम्बू द्वीप के सम्बन्ध बहुत प्राचीन हैं मोदी जी ने शी जिनपिंग की मुलाक़ात के लिए यह क्षेत्र चुना |

चीन के दक्षिण पूर्व में स्थित फुजियन ऐसा प्रांत में ऐसे स्थल हैं जिसके तार भारत के तमिलनाडू से जुड़ें हैं ग्वांगझू में 1300 साल पुराना काइयुआन मन्दिर है जिसमें श्री कृष्ण .शिव एवं नरसिंह भगवान की मूर्तियाँ हैं इनका जिक्र शी जिंगपिंग ने मन्दिरों को देखते समय मोदी जी से इनका जिक्र किया |मोदी जी की रूचि है उस स्थान से बुद्ध धर्म चीन पहुँचा था पल्लव वंश के राजा सुगंध के तीसरे बेटे बोधिधर्म ने चीन में ध्‍यान संप्रदाय (झेन बौद्ध धर्म) का प्रचार किया. उन्‍होंने बौद्ध धर्म में आत्‍मरक्षा के लिए दक्षिण भारत में प्रचलित मार्शल आर्ट को शामिल किया उन्हें चीन में भगवान गौतम बुद्ध से शुरू बौध धर्म की श्रंखला में रखा जाता है. उन्होंने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए कई काम किए थे. उन्‍होंने कई स्तूप, विहार और मठों का निर्माण कराया था. साथ ही संस्कृत बौद्ध ग्रंथों का चीनी भाषा में अनुवाद कराया था |बौद्ध धर्म का ध्यान सम्प्रदाय बौद्ध धर्म के प्रसार के दौरान जापान ,थाईलैंड इंडोनेशिया एवं पूर्व के कई सदूर देशों में पहुंचा मोदी जी की रूचि हैं उसी रूट पर चीन जापान एवं थाईलैंड से टूरिस्ट तमिलनाडू आयें | भारत अनोपचारिक यात्रा पर चेन्नई के ममल्लापुरम की यात्रा पर पधारे उनका खुले दिल से स्वागत हुआ उन्हें भारत की संस्कृति झांकियां दिखाई गये श्री जिनपिंग की इतिहास एवं संस्कृति में विशेष रूचि है

चीन की संस्कृति कन्फ्यूशियसवाद , बौद्ध धर्म एवं तोओवाद (प्रकृति पूजा )में विश्वास रखती है इन तीनों में काफी समानता है कुछ विचारकों के अनुसार चीनी जवानी में कन्फ़्यूशियस, दुःख में बौद्ध और बुढ़ापे और बीमारी में ताओ दर्शन का सहारा लेता है. मरणोपरांत अधिकांश व्यक्तियों का अंतिम संस्कार बौद्ध या ताओ रीतिरिवाजों के अनुसार किया जाता हैं |चीनी लोग किसी देवी-देवता को नहीं मानते लेकिन, अपने पूर्वजों की पूजा करते हैं| यहाँ इस्लाम धर्म को मानने वाले लोग भी रहते हैं लेकिन यूएन की रिपोर्ट के अनुसार चीन में 10 लाख मुस्लिमों को नजर बंद कर शिविरों में रखा गया है जिनमें उडगन मुस्लिम की संख्या सबसे अधिक है उन्हें अपनी धार्मिक मान्यताओं को छोड़ने के लिए बाध्य किया जा रहा है उन्हें घंटो कम्यूनिज्म का पाठ पढाया जाता है एवं ईसाइयों में प्रोटेस्टेंट और कैथोलिक धर्म के मानने वालों को कुछ बन्धनों के साथ मानने की आजादी है | चीन ख़ुद को नास्तिक तो कहता ही है, साथ में यह भी दावा करता है कि सभी धर्मालवंबियों अपनी आस्था को लेकर पूरी तरह से आज़ादी है?

ईसा पूर्व 550 में जन्में चीन के महान समाज सुधारक कन्फ्यूशियस के दर्शन को न चीनी भूले न सत्तासीन नीति विशेषज्ञ| कन्फ्यूशियस ने चीन के झोऊ राजवंश का उत्थान देखा था लेकिन समय के साथ राजवंश की श्री कम होती गयी चीन कई राज्यों में बट गया यह आपस में लड़ते झगड़ते रहते थे जनता दुखी थी| कन्फ्यूशियस ने बचपन में गरीबी को झेला था जिससे उनकी प्रतिभा में निखार बढ़ता रहा |53 वर्ष की अवस्था में वह चीन के लू शहर के मंत्री पद तक पहुंचे अपने कार्यकाल में उन्होंने कठोर दंड के बजाय अपराधी के चरित्र को सुधारने में उसके सदगुणों के विकास पर बल दिया | चीन वासियों को महान समाज सुधारक दार्शनिक ने नैतिकता का पाठ पढ़ाया| कन्फ्यूशियस के दर्शन उनके आदर्शों के प्रभाव से चीनी समाज में स्थिरता आई उनका दर्शन अपने समय में राजधर्म माना गया |आज भी चीनी पाठ्यक्रम में उनका दर्शन चीनी शिक्षा को प्रभावित करता है वह समाज सुधारक थे न कि धर्म गुरू |

वह मानते थे अच्छे शासन से शान्ति स्थापित होती है शासक सही अर्थों में शासक होना चाहिए उसके मंत्री कर्तव्य परायण हों ऐसे शासन तन्त्र के आदर्शों से प्रजा के आचरण में सुधार आता है नागरिक अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक हो कर अपने दायित्वों का ईमानदारी से पालन करते हैं | उनके अनुसार जीवन का मूल मन्त्र जीतने की इच्छा शक्ति ,सफलता पाने की लगन, किसी भी काम को अपनी पूरी क्षमता से करने की दृढ़ता,इससे हर व्यक्ति के लिए दुनिया में सबसे ऊंचा मुकाम हासिल करने का मार्ग प्रशस्त होता है | अँधेरे को कोसने के बजाए एक छोटा सा दीपक जलायेंरत्न रगड़ने के बाद चमकता है ऐसे ही संघर्षों से व्यक्ति का व्यक्तित्व निखरता है |किसी भी राष्ट्र की शक्ति वहाँ के निवासियों की सत्य निष्ठा और दृढ नैतिकता पर आधारित होती है|

चीन के लोगों में आम धारणा है सत्ता के महत्व को स्वीकार कर कानूनों का पालन करना हर नागरिक का कर्तव्य है वह कनफ्यूसियस को अपना मार्ग दर्शक मानते हैं चीन के लोगों को प्रजातंत्र समझ में नहीं आता इस पर घंटों लाल मुहँ कर बहस कर सकते हैं आपके तर्कों को काटते रहेंगे उनके लिए राष्ट्र प्रथम है उन्हें चीनी होने पर गर्व है अपनी भाषा मेंदारिन पर गर्व है भारत में अकसर प्रश्न उठते हैं चीन हमारे से बाद में आजाद हुआ लेकिन वहाँ हमसे अधिक तरक्की कैसे हुई ? क्या उसे एक पार्टी की तानाशाही का लाभ मिला ? हम उससे पीछे अवश्य रह गये परन्तु हमारा लोकतंत्र से विश्वास कभी नहीं टूटा देश ने प्रजातंत्र एवं मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सदैव कुर्बानी दी है|

शी जिनपिंग चीन के आजीवन राष्ट्रपति तानाशाह हैं छोटी अधखुली आँखें चेहरे में हर वक्त रहने वाली हल्की मुस्कराहट उनकी विशेषता है लेकिन महाबलीपुरम की अनौपचारिक वार्ता में वह सहज नजर आये |जिनपिंग ने सत्ता पर पकड़ बढाने के लिए तानाशाह के समान अपना शिकंजा कसा है | माओ के समय में जनता पर कठोरता से नियन्त्रण करने के लिए एक दूसरे से सीआईडी करवाई जाती थी लेकिन आधुनिक साधनों ने नियन्त्रण करने के साधन कैमरे से हरेक पर हर समय नजर रखना बहुत आसान हैं चीन जाने वाले सैलानियों पर एवं दूसरे देशों के व्यापारियों पर पूरी तरह से नजर रखी जाती है है वाट्स अप पर जरा भी संदेश चीन के खिलाफ लिखते ही वीजा खत्म कर वापिस भेज दिया जाता है प्रेस की आजादी ? सरकार जो चाहती है वही समाचार अपने नागरिकों को दिया जाता है | हांग कांग में चीन का जम कर विरोध हो रहा है चीन के उनपर कब्जा करने के इरादे बर्बर भी हो सकते हैं लेकिन चीन के नागरिक यही जानते हैं सब ठीक ठाक है|

चीन को सबसे अधिक बाजार चाहिए इसके साथ ही शी प्रसार वादी नीति पर चलने वाले उग्र राष्ट्रवादी हैं ।चीन हमसे आयात कम निर्यात फिर भी आँखे दिखाने से बाज नहीं आता चीन की नीति दूसरे देशों में निवेश की भी है | शी जिनपिंग देश को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था ही नही सबसे बड़ी शक्ति बनाना चाहते|


बोधिधर्म का ध्‍यान संप्रदाय या झेन बौद्ध धर्म बाद के वर्षों में जापान, थाईलैंड, इंडोनेशिया और पूर्व के दूरदराज देशों तक पहुंचा.

महाबलीपुरम में दो प्राचीन संस्कृतियों का मिलन आपसी रिश्तों की मजबूत कड़ी साबित होगा

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